-सुरक्षित प्रसव के लिए पीपीएच नियंत्रण, समय रहते प्रसव की जटिलता की पहचान करने के तरीके समझाये
-10 से 12 अप्रैल तक चली तीन दिवसीय फॉग्सी आर्ट ऑफ बर्थिंग कॉन्क्लेव 2026 का समापन

सेहत टाइम्स
लखनऊ। फॉग्सी आर्ट ऑफ बर्थिंग कॉन्क्लेव 2026 के तीसरे दिन सुरक्षित प्रसव, नॉर्मल डिलीवरी को बढ़ावा और जटिल मामलों के प्रबंधन पर जोर दिया गया, साथ ही प्रसवोत्तर रक्तस्राव (पीपीएच) नियंत्रण के लिए नई तकनीकों पर प्रशिक्षण दिया गया।
गर्भाशय को संकुचित करने के लिए यूटेरोटोनिक्स दवाओं का करना चाहिये प्रयोग
दिल्ली से आये डॉ. अशोक कुमार ने यूटेराइन काइनेटिक्स तथा प्रसव के दौरान यूटेरोटोनिक्स के उचित उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि सही समय पर इन इंजेक्शनों का उपयोग बच्चेदानी के संकुचन को प्रभावी बनाकर प्रसवोतर रक्तस्राव (PPH) को काफी हद तक नियंत्रित कर सकता है। यह तकनीक विशेष रूप से उन परिस्थितियों में जीवनरक्षक साबित होती है, जहाँ रक्तस्राव तेजी से बढ़ने की आशंका होती है। उन्होंने जोर दिया कि प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी यदि इन्हें सही प्रोटोकॉल के अनुसार समय पर उपयोग करें, तो मातृ मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है। उन्होंने पेरिफेरी स्तर पर कार्यरत डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण को अत्यंत आवश्यक बताया, ताकि आपात स्थिति में तुरंत प्रभावी कार्रवाई की जा सके।
प्रसव की जटिलता को समय रहते पहचानें
कोलकाता के डॉ. आशीष मुखोपाध्याय ने जटिल प्रसवों के प्रबंधन, विशेष रूप से ब्रीच, प्रीटर्म लेबर और उच्च जोखिम गर्भावस्था से जुड़े मामलों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि सही समय पर पहचान, क्लिनिकल निर्णय और आधुनिक तकनीकों के उपयोग से इन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में भी सुरक्षित प्रसव संभव है। उन्होंने यह भी बताया कि सीएचसी और पेरिफेरी स्तर पर कार्यरत डॉक्टर यदि उचित प्रशिक्षण और प्रोटोकॉल का पालन करें, तो जटिल मामलों को भी प्रभावी ढंग से संभाल सकते हैं, जिससे अनावश्यक रेफरल और जोखिम दोनों कम होते हैं।
ऑक्सिपिटो पोस्टेरियर पोजीशन में कैसे करायें सामान्य प्रसव
चेन्नई से आये डॉ. एन. पलानीअप्पन ने (ऑक्सिपिटो पोस्टेरियर पोजीशन) के प्रबंधन पर व्यावहारिक मार्गदर्शन देते हुए बताया कि कई बार प्रसव से पूर्व ऐसा होता है कि बच्चे का सिर तो गर्भाशय ग्रीवा की ओर होता है लेकिन उसका मुंह मां के पेट की तरफ होता है, यह स्थिति ‘ऑक्सिपिटो पोस्टेरियर’ पोजीशन कहलाती है जबकि आदर्श स्थिति में शिशु का मुंह मां की पीठ की तरफ ‘ऑक्सिपिटो-एंटीरियर’ होना चाहिये। उन्होंने बताया कि सही तकनीक और समय पर हस्तक्षेप से इस प्रकार के जटिल प्रसव को भी सामान्य रूप से कराया जा सकता है। उन्होंने रोटेशन तकनीकों के प्रभावी उपयोग पर जोर दिया, जिससे बच्चे की स्थिति को अनुकूल बनाकर प्रसव को सुरक्षित किया जा सके। उन्होंने कहा कि समय पर सही निर्णय लेने से प्रसव की जटिलताओं को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि प्रशिक्षित डॉक्टर इन तकनीकों के माध्यम से अनावश्यक सिजेरियन से बच सकते हैं। उन्होंने कौशल-आधारित प्रशिक्षण और अनुभव को इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण बताया।
आयोजन अध्यक्ष डॉ. प्रीति कुमार ने कहा कि कॉन्क्लेव का उद्देश्य डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देकर सुरक्षित मातृत्व को मजबूत करना है। उन्होंने बताया कि नई तकनीकों और स्किल-आधारित प्रशिक्षण के माध्यम से प्रसव को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सकता है। आयोजन सचिव डॉ. सीमा मेहरोत्रा ने कहा कि टीम वर्क, समय पर निर्णय और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका जटिल प्रसव स्थितियों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने जोर दिया कि निरंतर प्रशिक्षण से ही बेहतर परिणाम सुनिश्चित किए जा सकते हैं।
समापन सत्र में मुख्य अतिथि डॉ. एच. डी. अग्रवाल (महानिदेशक, परिवार कल्याण, उत्तर प्रदेश शासन) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. हेमांग शाह (निदेशक, हेल्थ एंड न्यूट्रिशन, CIFF) ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए इसे मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया।
विशेषज्ञों ने बताया कि प्रीटर्म लेबर, फीटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन, डायबिटीज और एनीमिया जैसी जटिलताएँ मातृ मृत्यु दर के प्रमुख कारण हैं, जिनके प्रबंधन के लिए प्रशिक्षण जरूरी है। इसी विषय पर उच्च-जोखिम गर्भावस्था में प्रसव प्रबंधन पर विशेष पैनल चर्चा आयोजित की गई। जिसमें (फीटल ग्रोथ रेस्ट्रिक्शन) (FGR), प्रीटर्म लेबर, डायबिटीज, गंभीर एनीमिया, हाइपरटेंसिव डिसऑर्डर तथा हृदय रोग जैसे विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषज्ञों डॉ. नरेंद्र मल्होत्रा, डॉ. संपत कुमारी, डॉ. नीरा अग्रवाल, डॉ. जतिंदर कौर और डॉ. गौरव देसाई ने अपने अनुभवों और साक्ष्य-आधारित प्रोटोकॉल साझा किए।
जटिल सिजेरियन पर आयोजित एक अन्य विशेषज्ञ पैनल में VBAC, रक्तस्राव, सर्जिकल जटिलताएं, ब्लैडर एवं बाउल इंजरी और एडहीजन्स जैसे विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई, जिससे प्रतिभागियों को जटिल परिस्थितियों की पहचान और समय पर प्रबंधन के कौशल विकसित करने में मदद मिली।

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