-एक तो अल्प वेतन, उसमें भी विलम्ब, पैदा हो रही है अमानवीय स्थिति : योगेश उपाध्याय

सेहत टाइम्स
लखनऊ। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), उत्तर प्रदेश के अंतर्गत कार्यरत अल्प वेतन भोगी संविदा स्वास्थ्य कर्मियों को विगत दिसम्बर 2025 से वेतन का भुगतान न होने के कारण प्रदेश भर में गंभीर आर्थिक, मानसिक एवं सामाजिक संकट उत्पन्न हो गया है। संविदा कर्मी पूर्णतः अपने मासिक वेतन पर निर्भर रहकर जीवन यापन करते हैं, ऐसे में वेतन में अत्यधिक विलम्ब एक अमानवीय स्थिति को जन्म दे रहा है।
यह जानकारी देते हुए संयुक्त राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कर्मचारी संघ, उत्तर प्रदेश के महामंत्री योगेश उपाध्याय ने बताया कि इसी क्रम में जनपद महराजगंज से सामने आई घटना ने संपूर्ण स्वास्थ्य तंत्र को झकझोर कर रख दिया है, जहाँ एक कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर (CHO) ने 8 फरवरी को वेतन न मिलने की निराशा और मानसिक दबाव के चलते आत्महत्या का नोट लिखते हुए आत्महत्या का प्रयास किया। सौभाग्यवश समय रहते उसके साथियों द्वारा उसकी जान बचा ली गई। यह घटना किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि प्रदेश में कार्यरत लगभग एक लाख संविदा स्वास्थ्य कर्मियों की पीड़ा, असुरक्षा और मानसिक दबाव का प्रतीक है।
उन्होंने बताया कि संयुक्त राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कर्मचारी संघ, उत्तर प्रदेश इस अत्यंत दुखद घटना पर गहरी संवेदना व्यक्त करता है तथा वेतन भुगतान में हो रहे निरंतर विलम्ब एवं संविदा कर्मियों के प्रति अपनाई जा रही अस्थायी व्यवस्था की कड़े शब्दों में निंदा करता है। स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विभाग में कार्यरत कर्मियों की इस प्रकार की उपेक्षा न केवल अमानवीय है, बल्कि इससे प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं एवं सरकार की सामाजिक छवि भी प्रभावित हो रही है।
योगेश उपाध्यान ने कहा कि संगठन द्वारा इस गंभीर विषय को लेकर उपमुख्यमंत्री, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को पत्र प्रेषित किया गया है तथा मुख्यमंत्री को भी प्रतिलिपि भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है।
संगठन की प्रमुख मांगें निम्नवत हैं—
1. NHM संविदा कर्मियों का लंबित वेतन अविलम्ब जारी किया जाए।
2. भविष्य में वेतन भुगतान के लिए स्थायी एवं समयबद्ध व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
3. संविदा कर्मियों की अस्थायी व्यवस्था समाप्त कर स्थायी नीति बनाई जाए, जिससे इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
उन्होंने कहा है कि यदि शीघ्र ठोस कार्यवाही नहीं की गई, तो संगठन प्रदेश स्तर पर आंदोलनात्मक कदम उठाने के लिए बाध्य होगा, जिसकी सम्पूर्ण जिम्मेदारी शासन एवं विभागीय अधिकारियों की होगी।

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