-हृदय के लिए भी अनुकूल है यह विधि, घर पर भी करना संभव

सेहत टाइम्स ब्यूरो
लखनऊ। गैर-संचारी रोग (एनसीडी) आज दुनिया के लिए एक बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं। ज्यादा चिंता की बात यह है कि भारत ऐसे देशों में से एक है, जहाँ एनसीडी में हो रही बढ़ोतरी की दर सबसे उच्च है। ऐसा ही एक रोग है क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी), जिसे क्रॉनिक रीनल फेलियर, क्रॉनिक रीनल डिजीज या क्रॉनिक किडनी फेलियर भी कहा जाता है। यह लोगों की जानकारी से कहीं अधिक व्यापक है और अच्छी तरह बढ़ने तक इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है या इसका पता नहीं चलता है। सीकेडी भारत में होने वाली मौतों और रुग्णता का एक बड़ा कारण है। लेकिन संतोषजनक बात यह है कि पेरिटोनियल डायलिसिस को प्रशिक्षण लेने के बाद घर पर ही करने की सुविधा है, जिस कारण इसमें लागत भी कम आती है। भारत में प्रति वर्ष एंड स्टेज रीनल डिजीज (ईएसआरडी) के करीब 2.2 लाख नये रोगी सामने आते हैं, इसलिये हर साल 3.4 करोड़ डायलिसिस की अतिरिक्त जरूरत पड़ती है।
क्रॉनिक किडनी डिजीज के मामले बढ़ने पर टिप्पणी करते हुए लखनऊ स्थित संजय गांधी पीजीआई के प्रोफेसर एवं प्रमुख, डिपार्टमेन्ट ऑफ नेफ्रोलॉजी डॉ. अमित गुप्ता ने कहा कि ‘‘भारत में सीकेडी सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या है। दुर्भाग्य से, जीवनशैली की समस्याओं के कारण क्रॉनिक किडनी डिजीज के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इसलिये, दुनियाभर में किडनी फंक्शन की हानि बढ़ने के कारण डायलिसिस की मांग बढ़ना तय है। इस रोग के उपचार के लिए कम लागत वाले और बड़े पैमाने के समाधानों की घोर आवश्यकता है। पेरिटोनियल डायलिसिस में अवसंरचना की स्थापना और रख-रखाव और कर्मचारियों की लागत नहीं लगती है, इसलिये इससे स्वास्थ्य रक्षा प्रणाली का बोझ कम होता है और रोगी को आजादी मिलती है। इस उपचार से डायलिसिस सेवाओं तक रोगियों की पहुँच भी समान रूप से बेहतर हो सकती है।’’
आपको बता दें कि पेरिटोनियल डायलिसिस (पीडी) मानक डायलिसिस थेरैपी का एक रूप है, जिसमें एक व्यक्ति के उदर के पेरिटोनियम का उपयोग ऐसी झिल्ली के तौर पर किया जाता है, जिसके माध्यम से तरल और घुलनशील पदार्थों को रक्त से बदला जाता है। मूलरूप से इमें डायलीसैट नामक एक स्वच्छता तरल की सहायता से शरीर के अपशिष्ट बाहर निकाले जाते हैं, जिसे एक कैथेटर के जरिये नाभि की लाइनिंग में डाला जाता है। इस ट्यूब के माध्यम से तरल को अशुद्धियों के साथ उदर के भीतर और बाहर धोया जाता है। इस प्रकार, डायलिसिस के इस रूप में रक्त शरीर के बाहर पंप नहीं किया जाता है।

डॉ. नारायण प्रसाद, नेफ्रोलॉजी प्रोफेसर, एसजीपीजीआईएमएस और सचिव, इंडियन सोसायटी ऑफ नेफ्रोलॉजी, लखनऊ ने कहा, ‘‘भारत में सीकेडी के बढ़ते मामलों को देखते हुए चिकित्सकों के लिए एक कदम आगे बढ़ना और डायलिसिस का सर्वश्रेष्ठ उपचार प्रदान करते हुए रोगियों की आवश्यकताओं को सम्बोधित करना महत्वपूर्ण है। भारत में सीकेडी के लिए उपचार के उन्नत और सुविधजनक तरीकों के साथ पेरिटोनियल डायलिसिस उपचार की एक महत्वपूर्ण विधि है, जो हृदय के लिए अनुकूल और घरेलू है।’’
उनका कहना है कि पेरिटोनियल डायलिसिस एक सुविधाजनक और घरेलू विधि है, जिसे सही प्रशिक्षण के बाद रोगी या उसके परिवार का कोई भी सदस्य कर सकता है। इस तरह के डायलिसिस का एक अन्य लाभ यह है कि इसमें हृदय पर दबाव नहीं पड़ता है और इसकी जटिलताएं न्यूनतम होती हैं। केवल एक बात का ध्यान रखना चाहिये कि पर्याप्त स्वच्छता बनाये रखें। अच्छी तरह हाथ धोने से संक्रमण का जोखिम यथासंभव कम होता है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन से सहयोग प्राप्त पीएमएनडीपी ने भी पीडी को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) पॉलिसी में शामिल किया है, ताकि थेरैपी तक लोगों की पहुँच बेहतर हो। इस पॉलिसी के अनुसार, गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) के रोगियों की 100 प्रतिशत सर्विस प्रोसीजर फीस कवर होगी। हालांकि, गैर-बीपीएल रोगियों को अपने नजदीकी जिला अस्पतालों में यह सेवा उसी मूल्य पर मिलेगी, जिसका भुगतान सरकार बीपीएल रोगियों के लिए करेगी। भारत सरकार ने साल 2016 में पीएम नेशनल डायलिसिस प्रोग्राम (पीएमएनडीपी) के अंतर्गत हीमोडायलिसिस को पेश कर एक बड़ा कदम उठाया था इसलिये सभी राज्यों में पेरिटोनियल डायलिसिस (पीडी) को शामिल करना जरूरी है, ताकि क्रॉनिक रीनल फेलियर के बढ़ते मामलों का उपचार हो सके।

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