अस्पतालों में होने वाली हिंसा की वजह है संवादहीनता

जानकारी देते डॉक्टर विनय श्रीवास्तव, साथ हैं डॉक्टर सरोज श्रीवास्तव, डॉक्टर पीके गुप्ता और डॉक्टर जेडी रावत।

लखनऊ। मरीज की मौत के बाद जब कभी भी हंगामा और हिंसा होती है, उसके लिए जिम्मेदार अस्पताल या चिकित्सक का प्रबंधन है, क्योंकि अधिकतर यह देखा गया है कि मरीज के इलाज व उसके परिणाम को लेकर चिकित्सक व अन्य स्टाफ की आपस में व मरीज के परिजनों के साथ संवादहीनता की स्थिति रहती है, ऐसे में मरीज के परिजन, जो अपने मरीज की मौत से दुखी होते हैं, उन्हें यह समझ आता है कि इलाज में लापरवाही की गयी है, नतीजतन अप्रिय घटनाएं घट जाती हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि हम एक ऐसी व्यवस्था रखें कि मरीज के परिजनों और हॉस्पिटल के बीच शुरू  से ही संवाद की स्थिति बनी रहे।  यह बात अमेरिका के सेेंट्रल फ्लोरिडा रीजनल हॉस्पिटल के प्रोफेसर विनय श्रीवास्तव ने कही। प्रो श्रीवास्तव मूलत: यहीं लखनऊ के हैं तथा किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के छात्र रह चुके हैं।
आपसी तालमेल बहुत जरूरी
प्रो श्रीवास्तव को इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की लखनऊ शाखा ने आज चिकित्सकों और मरीज के तीमारदारों के बीच अविश्वास के चलते बढ़ रहीं हिंसा की घटनाओं को लेकर इस पर चर्चा और समाधान के लिए डॉक्टरों के साथ चर्चा के लिए आमंत्रित किया था। आईएमए भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में बतौर अतिथि वक्ता प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि अमेरिका हो या भारत इस तरह की चुनौतियां सभी जगह एक सी हैं बस फर्क इतना है कि उससे निपटने के लिए क्या-क्या कदम उठाने चाहिये इस पर विचार करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि चिकित्सक और मरीज व परिजनों के बीच, अस्पताल के अन्य स्टाफ व मरीज के परिजनों के बीच तथा इलाज में कई चिकित्सक लगे हैं तो आपस में उनके बीच तालमेल होना बहुत आवश्यक है।
इलाज की प्रगति से अवगत कराते रहें
उन्होंने बताया कि मरीज के इलाज के दौरान उसकी स्थिति के बारे में हमेशा चिकित्सक को तीमारदारों को अवगत कराते रहना चाहिये, उदाहरण के लिए यदि मरीज की स्थिति नाजुक है तो तीमारदारों तक यह मैसेज बराबर पहुंचता रहना चाहिए कि हम लोग अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं यह कोशिश कामयाब भी हो सकती है और नहीं भी। उन्होंने बताया कि अनेक बार ऐसा होता है कि तीमारदार अगर अपने मरीज का हाल जानना चाहता है तो उसे कोई असलियत बताने वाला नहीं होता है, यही नहीं कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मरीज को कई विधाओं वाले चिकित्सक देख रहे हैं तो किसी एक चिकित्सक अपने इलाज की प्रगति के बारे में तो बता देता है लेकिन उसी मरीज को जो दूसरे चिकित्सक देख रहे हैं उनके इलाज व संभावित परिणाम के बारे में नहीं वह चिकित्सक नहीं बताता है जबकि हो सकता है उसी रोग से मरीज की जान को खतरा हो, ऐसे में जब मौत हो जाती है तो परिजन सोचते हैं कि डॉक्टर तो कह रहे थे पहले से ठीक है तो फिर यह अचानक कैसे हो गया, इसका मतलब कहीं न कहीं लापरवाही हुई है जबकि असलियत यह है मौत का कारण जिस चिकित्सक ने मरीज का हाल बताया था उससे संबंधी रोग नहीं है, उसकी मौत जिस वजह से हुई है उसका इलाज करने वाले चिकित्सक से तो परिजनों की बात ही नहीं हुई थी, इसका अर्थ यह हुआ कि अगर चिकित्सकों में आपसी  तालमेल होता और उस मरीज के बारे में उसका सम्पूर्ण हाल मरीज के परिजनों को बताया गया होता तो परिजनों में यह गलतफहमी न होती।
जानकारी देने व लेने वाले का पहले से कर लें चुनाव
प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि होना यह चाहिये कि पहले तो मरीज के परिजनों से हॉस्पिटल प्रबंधन की ओर से कह दिया जाना चाहिये कि  वे अपने किसी एक व्यक्ति को तय कर लें कि मरीज के हाल के बारे में जिनसे बात की जा सके, ऐसे में जब उस व्यक्ति को इलाज की प्रगति और संभावनाओं के बारे में जानकारी रहेगी तो वह अपने अन्य परिजनों को भी असलियत बता सकेगा कि मरीज की जान को खतरा है या नहीं। इसी प्रकार चिकित्सकों व अन्य स्टाफ की ओर से भी किसी एक व्यक्ति का चुनाव कर लेना चाहिये जो मरीज के उस परिजन को इलाज आदि के बारे में जानकारी दे। हॉस्पिटल प्रबंधन को यह ध्यान में रखना चाहिये कि यह व्यक्ति ऐसा हो जिसके अंदर वाकपटुता हो जिससे स्थिति बिगडऩे पर वह सही बात को पूरी होशियारी और ईमानदारी से रख सके और कह सके कि आई एम सो सॉरी फॉर यू। वह बड़ी ही शांतिपूर्वक और मर्माहत होते हुए यह कहे कि मरीज के फलां परिजन को इलाज और ठीक होने की संभावना के बारे में जानकारी पहले ही दी जा चुकी थी।
चिकित्सकों को ईगो दूर रखना होगा
प्रो विनय ने कहा कि चिकित्सकों को भी चाहिये कि वह अपना ईगो न रखें, हालांकि उन्होंने स्पष्टï किया कि मैं जानता हूं कि चिकित्सक ईगो जानबूझकर नहीं रखता है लेकिन अनेक बार ऐसी परिस्थितियां पैदा हो जाती हैं कि उसके अंदर ईगो आ जाता है लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि यही ईगो उसे अपने अंदर नहीं आने देना है। उन्होंने कहा कि ऐसा होता भी है कि चिकित्सक को भी बहुत अफसोस होता है कि पूरी कोशिश करने के बाद भी हम मरीज को नहीं बचा पाये लेकिन अगर मरीज के परिजन के साथ बराबर संवाद होता रहता तो यह अहसास मरीज के परिजनों को भी रहता कि डॉक्टर ने अपनी पूरी कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली।
मॉनीटरिंग बहुत जरूरी
उन्होंने कहा कि चिकित्सकों को चाहिये कि वे समय-समय पर नये-नये काननों व अन्य जानकारियों से अपडेट होते रहें। उन्हें चाहिये कि वह यह सुनिश्चित करें कि उन्होंने अपने अस्पताल में जो नीतियां निर्धारित की हैं उनका पालन हो रहा है अथवा नहीं, उनका स्टाफ दिये गये निर्देशों के अनुसार कार्य कर रहा है अथवा नहीं। कार्यक्रम में प्रो विनय श्रीवास्तव की मां व लखनऊ की सीनियर गायनाकोलोजिस्ट डॉ सरोज श्रीवास्तव, आईएमए लखनऊ शाखा के अध्यक्ष डॉ पीके गुप्ता, सचिव डॉ जेडी रावत के अलावा पल्मोनरी स्पेशियलिस्ट डॉ बीपी सिंह सहित अनेक चिकित्सक उपस्थित रहे।