-केजीएमयू के न्यूरो सर्जरी विभाग ने माइग्रेटरी (वांडरिंग) इंट्राक्रेनियल बुलेट को सर्जरी कर निकाला
-43 दिनों तक आईसीयू में गहन निगरानी के बाद बच्ची के स्वास्थ्य में उत्साहजनक सुधार

सेहत टाइम्स
लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU), लखनऊ के चिकित्सकों ने एक अत्यंत दुर्लभ और चुनौतीपूर्ण न्यूरोसर्जरी करते हुए तीन वर्ष की बच्ची के सिर में फंसी गोली (बुलेट) जो बार-बार अपना स्थान बदल रही थी, को सफलतापूर्वक निकालकर बच्ची को नयी जिंदगी दी है। अत्यन्त दुर्लभ माने जा रहे इस मामले में सफल उपचार में योगदान देने वाली टीम की सर्वत्र सराहना हो रही है। सर्जरी के लगभग 43 दिनों बाद बच्ची की स्थिति में उत्साहजनक सुधार है।
सर्जरी करने वाली टीम का नेतृत्व करने वाले न्यूरोसर्जरी विभाग के डॉ अंंकुर बजाज ने इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि इस मामले में तीन वर्षीय बच्चे के मस्तिष्क में माइग्रेटरी (वांडरिंग) इंट्राक्रेनियल बुलेट मौजूद थी, जिसे सफल सर्जरी के बाद सुरक्षित रूप से निकाल लिया गया, बच्ची की स्थिति में उत्साहजनक न्यूरोलॉजिकल सुधार देखा गया है।
मिली जानकारी के अनुसार लखनऊ के इंदिरा नगर बस्तौली में रहने वाली यह तीन वर्षीय बालिका 16 दिसम्बर की शाम को जब बच्चों के साथ घर की छत पर खेल रही थी, उसी समय अचानक सीमेंटेड शीट वाले शेड को पार करते हुए आयी गोली बच्ची के सिर में लग गयी। घरवालों ने समझा बच्चे खेल रहे हैं, किसी वजह से चोट लग गयी है, घरवालों के अनुसार वह डॉक्टर के पास ले गये जहां उसके सिर में टांके लगा कर वापस घर भेज दिया गया, जब रात को ज्यादा तबीयत खराब होने लगी तो घरवाले उसे लेकर गोमती नगर लोहिया संस्थान भागे जहां बेड न होने की वजह से उसे केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर रेफर कर दिया गया।
सर्जरी करने वाले डॉ अंकुर बजाज के अनुसार बच्ची को 16 दिसंबर 2025 को शाम लगभग 4:00 बजे लखनऊ में बाईं फ्रंटल बोन में गोली लगने से चोट लगी थी। चोट के लगभग 4.5 घंटे बाद एक बाहरी अस्पताल में कराए गए सीटी स्कैन में गोली मस्तिष्क के बाएं फ्रंटल क्षेत्र के सतही भाग में स्थित पाई गई।
जब बच्चे को अगले दिन केजीएमयू लाया गया, तब चोट के लगभग 20 घंटे बाद कराए गए दोबारा सीटी स्कैन में एक गंभीर और असामान्य स्थिति सामने आई—गोली मस्तिष्क के गहरे बेसल क्षेत्र की ओर खिसक चुकी थी। इस अप्रत्याशित गतिविधि से मस्तिष्क को और नुकसान तथा महत्वपूर्ण रक्त वाहिकाओं के प्रभावित होने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया।
डॉ अंकुर ने बताया कि चूंकि गोली बेसल क्षेत्र में पहुंच चुकी थी, इसलिए रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचने की आशंका को देखते हुए सर्जरी से पहले सीटी एंजियोग्राफी कराने का निर्णय लिया गया, ताकि यह पता लगाया जा सके कि गोली के कारण कोई रक्त वाहिकीय चोट तो नहीं हुई है और सर्जरी की सुरक्षित योजना बनाई जा सके। चोट के लगभग 25 घंटे बाद कराई गई सीटी एंजियोग्राफी में यह सामने आया कि गोली एक बार फिर खिसककर अब मस्तिष्क के ऑक्सिपिटल क्षेत्र में पहुंच चुकी थी।
डॉ अंकुर बताते हैं कि कम समय में की गई इन क्रमिक जांचों से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध हुआ कि यह एक माइग्रेटरी या वांडरिंग इंट्राक्रेनियल बुलेट का मामला है, जो विश्व स्तर पर बहुत ही कम रिपोर्ट किया गया है और इतने छोटे बच्चे में तो अत्यंत दुर्लभ है।
डॉ अंकुर के अनुसार अस्पताल में भर्ती के समय बच्चा सुस्त अवस्था में था तथा शरीर के दाहिने हिस्से में कमजोरी (राइट साइड हेमीपेरेसिस) थी, जिसके कारण हाथ-पैरों में बहुत कम हरकत थी। गोली के लगातार स्थान परिवर्तन, न्यूरोलॉजिकल कमी और आगे नुकसान की आशंका को देखते हुए तत्काल सर्जरी का निर्णय लिया गया।
यह जटिल न्यूरोसर्जिकल प्रक्रिया न्यूरोसर्जन डॉ. अंकुर बजाज द्वारा, डॉ. अनुप के. सिंह, डॉ. अंकन बसु और डॉ. श्रद्धा सहित न्यूरोसर्जरी टीम के साथ, विभागाध्यक्ष प्रो. बी. के. ओझा के कुशल मार्गदर्शन में सफलतापूर्वक की गई। प्रो. ओझा ने इस प्रकार के दुर्लभ और जटिल मामलों में अपने व्यापक अनुभव को साझा किया, जिसने सर्जिकल योजना और निर्णय-प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सर्जरी के दौरान सबसे बड़ी चुनौती गोली की लगातार बदलती स्थिति थी। इस चुनौती को इंट्राऑपरेटिव फ्लोरोस्कोपी की सहायता से सफलतापूर्वक संभाला गया, जिससे गोली की वास्तविक समय में सटीक स्थिति ज्ञात हो सकी और उसे आसपास के मस्तिष्क ऊतकों को न्यूनतम क्षति पहुंचाते हुए सुरक्षित रूप से बाहर निकाला गया।
इस उच्च जोखिम वाली बाल सर्जरी के दौरान एनेस्थीसिया प्रबंधन डॉ. मोनिका कोहली और डॉ. नीलकमल के नेतृत्व में किया गया, जिससे ऑपरेशन के दौरान बच्चे की स्थिति स्थिर बनी रही। सर्जरी के बाद बच्चे को पीडियाट्रिक आईसीयू में स्थानांतरित किया गया, जहां बाल रोग विभाग की टीम, प्रो. एस. एन. सिंह, डॉ. शालिनी त्रिपाठी और डॉ. स्मृति जैन के नेतृत्व में, उसकी निरंतर देखभाल और निगरानी की गई।
सर्जरी के बाद बच्चे की स्थिति में स्पष्ट न्यूरोलॉजिकल सुधार देखा गया। जहां पहले बच्चा सुस्त था और प्रभावित अंगों में कोई हरकत नहीं थी, वहीं अब वह अधिक सजग है और पहले कमजोर रहे हाथ से वस्तुएं पकड़ पा रहा है, जो उसके बेहतर स्वास्थ्य लाभ का संकेत है।
चिकित्सक दल ने बताया कि इस मामले की मुख्य चुनौतियों में गोली का अनियंत्रित रूप से स्थान बदलना, रक्त वाहिकाओं को क्षति पहुंचने का खतरा, बहुत छोटे बच्चे में सर्जरी के दौरान मस्तिष्क के महत्वपूर्ण हिस्सों को सुरक्षित रखना, तथा सटीक समय आधारित इमेजिंग और रियल-टाइम सर्जिकल मार्गदर्शन की आवश्यकता शामिल थीं। इन सभी चुनौतियों को त्वरित प्रबंधन, क्रमिक जांचों, विशेषज्ञ सर्जिकल नेतृत्व और बहु-विषयक टीमवर्क के माध्यम से सफलतापूर्वक पार किया गया।
कुलपति पद्मश्री प्रो. सोनिया नित्यानंद ने इस दुर्लभ और जटिल मामले के सफल उपचार पर पूरी चिकित्सा टीम को बधाई दी तथा बच्चे के स्वस्थ होने में योगदान देने वाले अनुभव, विशेषज्ञता और समन्वित प्रयासों की सराहना की। सर्जरी का यह मामला केजीएमयू की उच्च स्तरीय बाल न्यूरोसर्जिकल आपातकालीन सेवाओं की क्षमता को दर्शाता है और यह रेखांकित करता है कि माइग्रेटरी इंट्राक्रेनियल बुलेट की समय पर पहचान, उचित जांच और विशेषज्ञ सर्जिकल हस्तक्षेप से जटिल परिस्थितियों में भी सफल परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

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