एक समय था जब मैं नौकरी छोडऩे वाली थी…

दोहरी जिम्मेदारियों के साथ सफलता के पीछे के संघर्ष की दास्तां
आज 1 जुलाई है और आज डॉक्टर्स डे है। आज के समय में विकास के नये-नये आयाम स्थापित करने के लिए लगभग हर क्षेत्र में पुरुषों के साथ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी हैं। यहां यह बताना जरूरी है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था के तहत आज भी किसी परिवार को चलाने के लिए घर के अंदर के प्रबंधन की जिम्मेदारी महिलाओं के ही कंधों पर है। ऐसे में घर और कॅरियर दोनों की जिम्मेदारी निभाते हुए चिकित्सा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में भी महिलाओं के सफल योगदान पर चर्चा का सिलसिला शुरू करने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ ने डॉक्टर्स डे का दिन चुना। ‘सेहत टाइम्स’ इसी विषय पर एक कॉलम ‘दास्तां संघर्ष की’ शुरू कर रहा है। इसमें हम महिला चिकित्सकों द्वारा निभायी जा रही इस दोहरी जिम्मेदारी की सफलता के पीछे के संघर्ष के बारे में अपने पाठकों को बतायेंगे…

डॉ विनीता दास

दुनिया भर में अपनी अलग पहचान रखने वाले उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थापित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्व विद्यालय के क्वीनमैरी हॉस्पिटल तथा महिला एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉ विनीता दास बताती हैं कि वाकई घर के साथ कॅरियर की जिम्मेदारी को निभाना आसान नहीं होता है लेकिन अगर आपको सहयोग मिलता रहे तो इतना मुश्किल भी नहीं होता है। मेरे साथ भी ऐसा हुआ था, आज से करीब 29 साल पूर्व 1988 में उन दिनों जब मेरी बेटी बीमार थी साथ ही मेरे पति डॉ सिद्धार्थ दास भी घर के ही एक मसले को लेकर दौड़-भाग में जुटे हुए थे, मैं यहीं क्वीनमैरी में कार्यरत थी, ऐसी परिस्थितियों में मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था और मैं क्या करूं फिर मैंने यही सोचा कि नौकरी छोड़ दूं, ऐसे में उस समय मेरी विभागाध्यक्ष रहीं डॉ प्रभा मेहरा ने मुझे समझाया कि परेशान न हो, ऐसा जिंदगी में होता रहता है, तुम नौकरी मत छोड़ो… उन्होंने मुझे समझाते हुए पूरे सहयोग का आश्वासन दिया, जिसका नतीजा यह है कि मैं आज यहां अब तक अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही हूं।

परिवार का सहयोग भी कम नहीं रहा : डॉ विनीता दास

डॉ विनीता दास बताती हैं कि इसी प्रकार मुझे अपने परिवार से भी पूरा सहयोग मिला मेरे सास-ससुर और पति ने भी मेरे कॅरियर को बढ़ाने में अपना पूरा सहयोग दिया वरना मैं आगे बढ़ ही नहीं सकती थी। यही नहीं मेरे बच्चों ने भी मुझे पूरा सपोर्ट किया। मेरी जिम्मेदारियों को वे बराबर महसूस करते आये, वे मेरे प्रति अपने भाव, दुलार और प्यार खास मौकों पर अपने द्वारा बनाये गये ग्रीटिंग काड्र्स में उकेरते रहे। यह सब सोच कर असीम संतुष्टि मिलती है।

आमजन से अपील

डॉ विनीता दास कहती हैं कि हम लोग इतने महत्वपूर्ण पेशे में कार्य करते हैं और किन परिस्थितियों में कार्य करते हैं इसके बारे में समाज के उन लोगों को भी अहसास करना चाहिये जो चिकित्सकों को नकारात्मक दृष्टि से ही देखते हैं। उन्होंने कहा कि मैं यह कहना चाहती हूं कि अगर वह गर्भावस्था के दौरान स्त्री का समुचित ध्यान रखा जाये तो डिलीवरी के समय इतनी दिक्कतें नहीं आती हैं। कोई डॉक्टर अपने मरीज को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता है। उन्होंने बताया कि अक्सर यहां महिलाएं 4 और 5 हीमोग्लोबिन वाली आती हैं ऐसे में उनकी सेफ डिलीवरी कराना किसी चुनौती से कम नहीं होता है।