स्‍वाइन फ्लू जैसे संचारी रोगों से बचाने में कारगर हैं दादी-नानी की हिदायतें

स्वाइन फ्लू संवेदीकरण कार्यशाला में पल्‍मोनरी विशेषज्ञ डॉ सूर्यकांत ने दिये टिप्‍स

लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व विद्यालय के पल्‍मोनरी विभाग के हेड डॉ सूर्यकांत ने कहा है कि हमारी संस्‍कृति बहुत ही वैज्ञानिकता से भरी हुई है, छोटी-छोटी बातों के पीछे का वैज्ञानिक पहलू है जिसे बहुत ही आसानी से अपने कार्य व्‍यवहार में ढाल कर मनुष्‍य अनेक प्रकार के रोगों से बच सकता है, इन्‍हीं में एक है बाहर से आने पर शारीरिक सफाई। उन्‍होंने कहा बचपन में दादी-नानी की बातों के पीछे छिपे उद्देश्‍य बहुत मूल्‍यवान होते थे, उनका यह कहना कि कोई भी सदस्‍य बाहर से घर के अंदर आने के बाद बिना हाथ, पैर, मुंह धोये रसोई घर में प्रवेश नहीं करने दिया जायेगा। इसके पीछे का उद्देश्‍य देखें तो संचारी रोगों से बचाव का यह एक कारगर उपाय है।

 

डॉ सूर्यकांत ने यह बात बुधवार को यहां मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय के सभागार में चिकित्‍सकों के लिए आयोजित एक दिवसीय स्वाइन फ्लू संवेदी करण कार्यशाला में कही।  इस कार्यशाला का उद्घाटन निदेशक ,संचारी रोग डॉ मिथिलेश चतुर्वेदी ने किया। डॉ सूर्यकांत ने बताया कि हमारी संस्कृति में संचारी रोगों से बचाव के लिए घर में ही शिक्षा दी जाती थी दादी-नानी सभी को बाहर से आने पर पहले हाथ पैर और मुंह धोकर ही रसोई घर में प्रवेश करने देती थीं।

इन लोगों को रहता है ज्‍यादा खतरा

डॉ सूर्यकांत ने स्वाइन फ्लू के बारे में बताया कि स्वाइन फ्लू का संक्रमण व्यक्ति को स्वाइन फ्लू के रोगी के संपर्क में आने पर होता है। इस रोग से प्रभावित व्यक्ति को स्पर्श करने जैसे हाथ मिलाना, उसके छींकने, खांसने  या पीड़ित व्यक्ति की वस्तुओं के संपर्क में आने से स्वाइन फ्लू से कोई व्यक्ति ग्रसित होता है। खांसने, छींकने, आमने-सामने निकट से बातचीत करते समय रोगी से स्वाइन फ्लू के वायरस दूसरे व्यक्ति के श्वसन तंत्र नाक, कान,मुंह में प्रवेश कर जाते हैं। अनेक लोगों में वह संक्रमण बीमारी का रूप नहीं ले पाता या कई बार सर्दी जुकाम और गले में खराश तक ही सीमित रहता है। ऐसे लोग जिनका प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर होता है जैसे बच्चे, वृद्ध, मधुमेह या एचआईवी से ग्रसित व्यक्ति, दमा और ब्रोंकाइटिस के मरीज, नशा करने वाले व्यक्ति को कुपोषण ,एनीमिया या अन्य बीमारियों से प्रभावित लोग, गर्भवती महिलाएं इस संक्रमण की चपेट में जल्दी आते हैं। उन्‍होंने बताया कि गर्भवती महिलाओं में संक्रमण के कारण मृत्यु दर तुलनात्मक रूप से अधिक होती है।

स्वाइन फ़्लू नाम गलत यह है पैंडेमिक इन्फ्लूएंजा

कार्यशाला में केजीएमयू की माइक्रोबायोलॉजी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ अमिता जैन ने  बताया कि स्वाइन फ़्लू नाम गलत है इसे अब पैंडेमिक इन्फ्लूएंजा कहा जाता है। इसके वायरस तीन प्रकार के होते हैं ए, बी और सी, जिसमें ए सबसे ज्यादा खतरनाक होता है। यह वृद्ध व्यक्तियों के लिए ज्‍यादा खतरनाक होता है। इसकी जांच के लिए गले अथवा नाक से स्वाब लिया जाता है, कॉटन में स्वाब नहीं होना चाहिए। डेकरान अथवा नायलॉन में स्वाब लेना चाहिए।

 

सर्दी-जुकाम के सभी मरीजों की स्‍वाइन फ्लू जांच आवश्‍यक नहीं

निदेशक संचारी रोग डॉ मिथिलेश चतुर्वेदी ने कहा कि चिकित्सकों को सर्दी, जुकाम बुखार के सभी मरीजों को जांच के लिए नहीं भेजना चाहिए। केवल कैटेगरी सी के रोगियों को ही जांच के लिए भेजा जाना चाहिए। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर नरेंद्र अग्रवाल ने बताया कि स्वाइन फ्लू से घबराने की जरूरत नहीं है। इसकी रोकथाम के लिए सभी उपाय किए जा रहे हैं। पर्याप्त मात्रा में स्वाइन फ्लू की दवा तथा मास्क सीएमओ कार्यालय में मौजूद हैं। कार्यक्रम में केजीएमयू की बालरोग विशेषज्ञ डॉ शालिनी त्रिपाठी तथा नोडल अधिकारी वेक्टरबॉर्न डा केपी त्रिपाठी ने भी स्वाइन फ्लू के बारे में जानकारी दी।

डॉ सूर्यकांत की स्‍वाइन फ्लू पर लिखी किताब का विमोचन

इस मौके पर मुख्‍य चिकित्‍सा अधिकारी डॉ नरेन्‍द्र अग्रवाल ने डॉ सूर्यकांत की स्‍वाइन फ्लू पर लिखी किताब ‘जानिये स्‍वाइन फ्लू को’ का विमोचन भी किया। हिन्‍दी में लिखी इस किताब में बहुत ही सरल शब्‍दों में स्‍वाइन फ्लू के बारे में विस्‍तार से जानकारी दी गयी है।