होम्योपैथिक दवाओं से विकसित होती है रोग प्रतिरोधक क्षमता

लखनऊ। होम्योपैथिक औषधियां बच्चों के पेट में होने वाले क्रिम को निकालने एवं उनकी वजह से बच्चे के शरीर में होने वाले विकारों दूर करने में पूरी तरह सक्षम है इसके साथ ही यह दवाएं बच्चे के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर कीड़े के पुनः संक्रमण की सम्भावना को कम करती हैं।
यह जानकारी राष्ट्रीय कृमि मुक्ति दिवस की पूर्व संध्या पर वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ अनुरुद्ध वर्मा ने दी। उन्होंने बताया कि बच्चों के पेट में कृमि होना एक आम समस्या है जो दूषित पानी पीने एवं भोजन करने, नंगे पैर चलने, अधपका मांस खाने, संक्रमित भोजन, फल, एवं सब्जियां खाने, संक्रमित व्यक्ति एवं जानवरों के सम्पर्क में रहने से होता है। उन्होंने बताया कि बच्चे के पेट के कीड़े उसके शरीर से पोषक तत्व ले लेते हैं जिसके कारण बच्चा कमजोर हो जाता है, वजन कम हो जाता है, इसके अतिरिक्त भूख न लगना, दांत किटकिटाना, मिचली, खून की कमी, पेट में दर्द, चिड़चिड़ापन, त्वचा पर चकत्ते, मल द्वार पर खुजली, शारीरिक विकास रुक जाना आदि लक्षण होते हैं।

उन्होंने बताया कि पेट के कीड़ों के संक्रमण से बचने के लिए धुली एवं साफ की गयी सब्जियां, फलों का प्रयोग करना चाहिए। अधपका मांस नहीं खाना चाहिए। खाना बनाने से पहले पूरी तरह स्वच्छता निश्चित कर लेनी चाहिए, फलों एवं सब्जियों को साफ कर लेना चाहिए। जमीन पर गिरे फल एवं भोजन आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। साबुन से हाथ धोकर ही कोई चीज खाना चाहिए। बच्चे को नंगे पांव जमीन पर नहीं घूमने देना चाहिए। घरेलू जानवरों के सम्पर्क से बचाना चाहिए तथा घरेलू जानवर को कृमि नाशक दवाई अवश्य खिला देना चाहिए।
उन्होंने बताया कि बच्चे के लक्षणों के आधार पर पेट के कीड़ों को निकालने एवं शरीर पर होने वाले कुप्रभावों को दूर करने के लिए सिना, सेन्टोनाइन, फिलिक्स मास, चिमिपोडियम, टियुक्रियम, चिलोन आदि दवाइयों का प्रयोग चिकित्सक की सलाह पर किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कीड़ों से बचने के लिए साफ-सफाई सबसे बड़ी जरूरत है इसलिये इस पर पूरा ध्यान देना चाहिए।
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