-इलाज के लिए भर्ती किये जाने वाले नवजात शिशु के साथ माताओं को भी रखा जा सकेगा
-44 बेड की डेडीकेटेड पीडियाट्रिक यूनिट में 24 बेड होंगे मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट के
सेहत टाइम्स
लखनऊ। बख्शी का तालाब स्थित राम सागर मिश्र संयुक्त चिकित्सालय में 1 माह के अंदर 24 बेड वाली मदर-न्यूबॉर्न केयर यूनिट (MNCU) की सुविधा मिलने वाली है, यह लखनऊ की प्रथम एमएनसीयू होगी, इस यूनिट की विशेषता है कि प्रसव के बाद जिन शिशुओं को इलाज की जरूरत होगी उन्हें उनकी माता के साथ ही भर्ती किया जा सकेगा। यह एक ऐसी सुविधा है जो बीमार और छोटे नवजात शिशुओं की देखभाल उनकी माताओं के साथ मिलकर करती है। इसका लक्ष्य माँ और बच्चे के बीच की दूरी को कम करना है। अस्पताल में 44 बेड की डेडीकेटेड पीडियाट्रिक यूनिट तैयार की गयी है, इसीमें एमएनसीयू (माता के साथ नवजात को भर्ती किये जाने वाले) के 24 बेड होंगे जबकि 20 बेड पर बीमार अकेले बच्चों को भर्ती किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त अस्पताल में 6 प्राइवेट रूम की भी शुरुआत की जा रही है। वर्तमान में यहां 112 बेड संचालित हो रहे हैं, इन नये 50 बेड (24+20+06) के बाद अस्पताल में कुल 162 बेड का संचालन किया जायेगा।
यह जानकारी अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ वीके शर्मा ने शनिवार 22 मार्च को एक पत्रकार वार्ता मेें देते हुए बताया कि जैसा कि अध्ययनों में पाया गया है कि शिशु को जन्म के बाद ज्यादा से ज्यादा माता के साथ रहना माता और शिशु दोनों की सेहत के लिए फायदेमंद है। लेकिन वर्तमान में माँ और नवजात शिशु देखभाल सेवाएँ इस तरह से व्यवस्थित हैं कि यदि बच्चा सामान्य है, तो माँ और बच्चा प्रसवोत्तर वार्ड में एक साथ रहते हैं। लेकिन अगर बच्चा बीमार है या उसका जन्म के समय वजन कम है, तो उसे माँ से अलग करके विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) में रखा जाता है, जबकि माँ प्रसवोत्तर वार्ड में रहती है और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की सलाह पर ही एसएनसीयू में बच्चे से मिलने जाती है। अब एमएनसीयू के प्रारम्भ हो जाने के बाद से शिशुओं के साथ माताओं को भी भर्ती किया जा सकेगा।
पत्रकार वार्ता में उपस्थित इस इकाई के प्रभारी डॉ शैलेन्द्र कुमार सिंह ने बताया कि दुनिया भर में सभी नवजात शिशुओं में कम वजन यानी 2.5 किलोग्राम से कम वजन वाले शिशु का प्रतिशत 15 है। इनमें 78 फीसदी बच्चों की मौत तीन कारणों 1. लो बर्थ रेट-प्री मेच्योर डिलीवरी 2. संक्रमण तथा 3. बर्थ एसफाइक्सिया यानी जन्म से पूर्व, जन्म के दौरान या जन्म के बाद पर्याप्त ऑक्सीजन न मिलने से हो जाती है। एमएनसीयू की विशेषताओं के बारे में डॉ शैलेन्द्र ने बताया कि इस इकाई में • मां और बच्चे की 24×7 देखभाल • रेडिएंट वार्मर, सीपीएपी मशीन, ऑक्सीजन और सक्शन सुविधाओं सहित लेवल II गहन देखभाल उपकरण • प्रसव के बाद माताओं की देखभाल • माताओं और शिशुओं की प्रसवोत्तर देखभाल करने वाली नर्स की सुविधा मिलती है।


एमएनसीयू के लाभ बताते हुए डॉ वीके शर्मा ने कहा कि इससे • स्तनपान की उच्च दर • दैनिक देखभाल में माताओं की अधिक भागीदारी • परिवार के सदस्यों के लिए बेहतर सीखने के अवसर • परिवार के सदस्यों के लिए तनाव का स्तर कम • शिशुओं की मृत्यु दर कम • शिशुओं में हाइपोथर्मिया कम तथा • शिशुओं में सेप्सिस की कम आशंका रहती है। उन्होंने बताया कि एमएनसीयू देखभाल के एक ऐसे मॉडल का उदाहरण है जो जन्म से लेकर डिस्चार्ज होने तक माँ और बच्चे की एक साथ देखभाल करता है।
डॉ शैलेन्द्र ने कहा कि नवजात शिशुओं की नियमित देखभाल में माताओं और परिवारों की भागीदारी न केवल शिशु के अल्पकालिक और दीर्घकालिक स्वास्थ्य और विकास परिणामों को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है, बल्कि परिवारों द्वारा देखभाल के समग्र अनुभव को बेहतर बनाने के लिए भी आवश्यक है। यहीं पर जन्म के बाद माताओं और उनके छोटे और बीमार शिशुओं के बीच ‘शून्य अलगाव’ और माँ-नवजात शिशु देखभाल इकाई (MNCU) की अवधारणा सामने आती है।
डॉ शर्मा ने बताया कि एमएनसीयू कैसे अस्तित्व में आया, यह जानने से पहले कंगारू मदर केयर (केएमसी) नामक जीवन रक्षक हस्तक्षेप को समझना महत्वपूर्ण है। जिस प्रकार कंगारू अपने बच्चे को अपने शरीर में बनी थैली में रखकर उसकी देखभाल करता है उसी प्रकार व्यवस्था तैयार की गयी जिसमें मां अपने कम वजन वाले बच्चे को लंबे समय तक अपनी छाती से लगातार त्वचा से त्वचा के संपर्क में रखती है, और बच्चे को केवल स्तन के दूध से दूध पिलाने के लिए सहायता प्राप्त करती है। केएमसी कम वजन वाले शिशुओं के लिए सबसे प्रभावी हस्तक्षेपों में से एक है जो न केवल मृत्यु के जोखिम को 40% तक कम करता है, बल्कि माँ के मानसिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनके विकास और वृद्धि में भी सुधार करता है।
अस्पताल में बनेगी लैक्टेशन मैनेजमेंट यूनिट
अस्पताल में एक लैक्टेशन मैनेजमेंट यूनिट भी स्थापित की जायेगी, जहां माताओं के दूध को सुरक्षित रखा जा सकेगा। डॉ शर्मा ने बताया कि प्रसव के बाद कुछ माताओं को ज्यादा मात्रा में दूध आता है, इस अतिरिक्त दूध को सुरक्षित रखने की व्यवस्था की जायेगी, ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके।
