16 मई, 2009 को भारत में सामने आया था स्वाइन फ्लू का पहला केस

आठ साल बाद भी मानव प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए पहेली बना हुआ है स्वाइन फ्लू

प्रो सूर्यकान्त

लखनऊ. भारत में 16 मई 2009 को भारत में स्वाइन फ्लू के पहले रोगी के पाये जाने की चिकित्सकीय पुष्टि हुई में अब तक इस रोग से हजारों लोग संक्रमित हो चुके हैं जिससे लगभग 1300 मौतें हो चुकी हैं।

यह जानकारी देते हुए केजीएमयू के पल्मोनरी विभाग के विभागाध्यक्ष व इंडियन चेस्ट सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ सूर्यकांत ने बताया कि वर्ष 2009 की स्वाइन फ्लू की बीमारी इन्फ्लूएंजा ‘ए’ टाइप के एक नये विषाणु एच1 एन1 के कारण है इस विषाणु के अन्दर सुअर मनुष्यों और पक्षियों को संक्रमित करने वाले फ्लू विषाणु का मिला-जुला जीन पदार्थ है तीनों के पुनर्योजन से बना यह नया एच1 एन1 मानव समुदाय और उसके प्रतिरक्षा तन्त्र के लिए अभी तक पहेली बना हुआ है।

उन्होंने बताया कि जीन परिवर्तन से बनी यह किस्म ही मैक्सिको, अमेरिका और पूरे विश्व में स्वाइन फ्लू के प्रसार का कारण बनी। कुछ ही महीनों में दुनिया भर में हजारों व्यक्तियो के संक्रमित होने के बाद 18 मई 2009 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा स्वाइन फ्लू को महामारी घोषित किया गया।

आठ साल पहले महामारी घोषित हो चुका स्वाइन फ्लू मानव समुदाय और उसके प्रतिरक्षा तन्त्र के लिए अभी तक पहेली बना हुआ है। बदलते मौसम के साथ ही पिछले कुछ समय से स्वाइन फ्लू वायरस संक्रमण की लहर पुन: चल निकली हैं। केवल यूपी में ही इस साल 850 मामले सामने आये है। दो दर्जन से अधिक लोग काल-कवलित हो चुके हैं। ऐसे में आम लोगो की कीमती जानें बचाने के लिए वायरस के संक्रमण के प्रसार पर रोकथाम लगाई जायें।

डॉ. सूर्यकांत ने बताया कि आम बोलचाल में स्वाइन फ्लू के नाम से जाना जाने वाला इन्फ्लुएन्जा एक विशेष प्रकार के वायरस (विषाणु) इन्फ्लुएन्जा ए एच1 एन1 के कारण फैल रहा है। यह विषाणु सुअर में पाये जाने वाले कई प्रकार के विषाणुओं में से एक है। मार्च 2009 में दक्षिण अमेरिका में इस नये वायरस की खोज हुई फिलहाल जीनीय परिवर्तन होने के कारण यह विषाणु बेहद घातक और संक्रामक बन गया था।

डॉ. सूर्यकांत ने बताया कि विषाणुओं के जीन पदार्थ में स्वाभाविक तौर पर परिवर्तन होते रहते हैं। फलस्वरूप इनके आवरण की संरचना में भी परिवर्तन आते रहते हैं। यह परिवर्तन यदि बहुत कम है तो इसकी एण्टीजेनिक प्रकृति, एवं शरीर की प्रतिरक्षा तन्त्र द्वारा पहचान और रोकथाम के तरीके में बदलाव नहीं होता। बडे परिवर्तन की स्थिति प्रतिरक्षा तन्त्र को विषाणु का मुकाबला करने में अक्षम बना देती है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शरीर के प्रतिरक्षा तन्त्र के पास उससे निबटने के लिए एंटीबॉडीज का अभाव होता है।