वह महान योगी जिसने संसार-भर को योग का मार्ग दिखाया

स्वामी योगानन्द गिरि

-स्वामी ईश्वरानंद गिरी (योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया )

वाराणसी के बंगाली टोला क्षेत्र में स्थित एक घर के बड़े दालान में भक्तों की भीड़ लगी थी। भक्त जन अपने गुरु, श्री श्यामा चरण लाहिड़ी (जो लाहिड़ी महाशय के नाम से प्रसिद्ध हैं), के दर्शन के लिए इंतज़ार कर रहे थे। तभी एक महिला ने, गोद में अपने नन्हें शिशु को लेकर, उस भीड़ में प्रवेश किया।

वे अपने बच्चे को उस संत से आशीर्वाद दिलवाना चाहती थी, परंतु भीड़ के कारण आगे नहीं जा पा रही थी। तब उन्होंने संत से मन-ही-मन प्रार्थना की। जब उनकी प्रार्थना तीव्र हुई तो संत ने अपनी आँखें खोलीं और उस माँ को आगे आने को कहा। युवामाता ने उस शिशु को लाहिड़ी महाशय के चरणों में रखा।

संत ने आशीर्वाद स्वरूप अपना हाथ उस शिशु के ललाट पर रखा और कहा, “छोटी माँ! तुम्हारा पुत्र एक योगी होगा। एक आध्यात्मिक इंजिन बनकर वह अनेकों आत्माओं को ईश्वर के साम्राज्य में ले जाएगा।“

वह नन्हा-सा शिशु बड़े होकर परमहंस योगानन्द बने जो पूरे विश्व में अपनी पुस्तक, “Autobiography of a Yogi” (हिन्दी में योगी कथामृत), के कारण सुप्रसिद्ध हैं। यह पुस्तक 1946 में प्रथम बार प्रकाशित हुई थी और तब से लेकर आज तक यह 45 भाषाओं में अनुवादित हो चुकी है, जिसमें 13 भारतीय भाषाएँ भी शामिल हैं। प्रकाशन के 70 साल बाद भी इस पुस्तक की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है, और 1999 में इसे शताब्दी की 100 सर्वोत्तम आध्यात्मिक पुस्तकों की सूची में शामिल किया गया।

परमहंस योगानन्द, जिनका जन्म गोरखपुर में 5 जनवरी 1893 को हुआ था, और जिनका संन्यास लेने से पहले नाम था मुकुन्द लाल घोष, बचपन से ही आध्यात्मिक प्रवृत्ति के थे। जब वे मात्र छः वर्ष के थे, तब उन्हें ईश्वर का दिव्य दर्शन हुआ, जिस से उनकी भक्ति-पिपासा और भी तीव्र हो गई। ग्यारह वर्ष की उम्र में योगानन्द जी की माता का अकस्मात निधन हो गया। इस त्रासदी ने योगानन्द जी के पहले-से ही आध्यात्मिक मन को तीव्र वैराग्य से भर दिया और जीवन के अंतिम सत्यों को समझने के लिए वे गुरु की खोज करने लगे। जगन्माता की कृपा से उनकी यह खोज बंगाल के श्रीरामपुर शहर में वास कर रहे एक संत, स्वामी श्री युक्तेश्वर जी, के चरणों में आकार समाप्त हुई।

स्वामी श्री युक्तेश्वर जी के आश्रम में रहते हुए, किशोर मुकुन्द ने क्रिया योग विज्ञान एवं कठोर अनुशासन के साथ-साथ श्रीमद भगवद गीता, पतंजलि योग सूत्र एवं बाइबल के गूढ अर्थों को भी सीखा। गुरु की कृपा से उसी आश्रम में उन्हें ईश्वर-साक्षात्कार भी प्राप्त हुआ।

सन 1915 में उनके गुरु ने उन्हें संन्यास की दीक्षा दी और उन का नाम रखा स्वामी योगानन्द गिरि।

अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होनें क्रिया योग विज्ञान के प्रचार के लिए एक संस्था की स्थापना की। 22 मार्च 1917 के दिन, पश्चिम बंगाल के असनसोल ज़िला में स्थित डिहिका नाम के एक छोटे से गांव में उन्होनें 7 बच्चों को लेकर एक “ब्रह्मचर्य विद्यालय” शुरू किया। 1918 में उन्होनें उस विद्यालय को रांची में स्थानांतरित किया जो परवर्ती काल में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया बनी। 1920 में अपने गुरु से आशीर्वाद लेकर वे अमेरिका गए और वहाँ 1925 में उन्होनें एक औरसंस्था की स्थापना की जिसका उन्होनें नाम रखा सेल्फ-रियालाइज़ेशन फ़ेलोशिप।

भारतीय उपमहाद्वीप में योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया और विश्व के बाकी देशों में सेल्फ-रियालाइज़ेशन फ़ेलोशिप के माध्यम से परमहंस योगानन्द जी द्वारा सिखाया गया क्रिया योग विज्ञान आज भी सभी सत्यान्वेशियों के लिए उपलब्ध है।

परमहंस योगानन्द जी क्रिया योग को “वायुयान मार्ग” कहते थे। क्रिया योग एक प्राचीन प्राणायाम विज्ञान है जिसका उल्लेख हमें श्रीमद भगवद गीता एवं पतंजलि के योग सूत्रों में भी मिलता है। लेकिन 19वीं सदी तक यह गुप्त विज्ञान गुरु द्वारा केवल योग्य शिष्यों को व्यक्तिगत रूप से सिखाया जाता था।

परमहंस जी ने अपने गुरु की अनुमति और आशीर्वाद लेकर इस विज्ञान को सभी पिपासुओं और मुमुक्षुओं के लिए उपलब्ध कराया| उनके अथक प्रयासों के कारण भारत और अमेरिका में ही नहीं, वरनपूरे विश्व में लाखों साधक क्रिया योग के अभ्यास से लाभान्वित हो रहे हैंऔरलाखों जीवन रूपांतरित हो रहे हैं|

क्रिया योग के बारे में परमहंस योगानंद जी लिखते हैं“क्रिया योग एक सरल मनः कायिकप्रणालीहै जिसके द्वारा मानव रक्त कार्बन रहित हो कर ऑक्सीजन से प्रपूरितहो जाता है | इस अतिरिक्त ऑक्सीजन के अणु प्राण धारा में रूपांतरित हो जाते हैं जो मस्तिष्क और मेरुदंड के चक्रों में नवशक्ति का संचार कर देती है|”

पूरे विश्व में फैले लाखों क्रिया योगी अपने सभी पारिवारिकएवं सामाजिक उत्तरदायित्वोंको पूरा करते हुए , क्रिया योग के अभ्यास को अपने दैनिक जीवन में आसानी से सम्मिलित  करते हुए एकसंतुलित जीवन जीने की कला सीख रहे हैंऔर अपने जीवन में सर्वांगीण विकास एवं सफलता अनुभव कर रहे हैं|

क्रिया योग एक विज्ञान है और किसी भी विज्ञान की भांति इसके सिद्धांत भी सार्वभौमिक हैं और हर कोई इसका लाभ प्राप्त कर सकता है, चाहे वह किसी भी देश का, जाति का, संप्रदाय का या धर्म का क्यों न हो | स्त्री एवं पुरुष, वृद्ध एवं युवा सभी इसे अपना सकते हैं|

क्रिया के लाभ के बारे में स्वामीश्री युक्तेश्वर अपनेशिष्यों को बताते थे“ क्रिया योग एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा मानवी क्रम विकासकी गति बढ़ाईजा सकती है |”

योगीकथामृत में परमहंस जी लिखते हैं“ क्रिया योगी मन से अपनी प्राणशक्ति को मेरुदंड के छः चक्रों में ऊपर नीचे घुमाते हैं| मनुष्य के सूक्ष्मग्राही मेरुदण्ड में आधे मिनट के प्राणशक्ति केऊपरनीचे प्रवहन से उसके क्रम विकास में प्रगति होती है | आधे मिनट की यह क्रिया एक वर्ष की स्वाभाविक तौर पर होनेवाली आध्यात्मिक उन्नति के बराबर होती है |”

परमहंस जी जानते थेकि उनके शरीरछोड़कर चले जाने के बाद भी ऐसे कई लोग आयेंगे जो ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलना चाहेंगे | मानवजाति की आने वाली पीढ़ियों के लिए क्रिया योग विज्ञान कीशिक्षाओंको उपलब्ध कराने के लिए उन्होंने अपनी शिक्षाओं को “योगदा सत्संग पाठमाला” के रूप में संकलित करवाया जो कि डाक द्वारा योगदा सत्संग से हर कोईप्राप्त कर सकता है ये पाठ अंग्रेज़ी एवं हिन्दी में उपलब्ध हैं| और इनको पढ़ने के लिए एक ही योग्यता की आवश्यकता है- आत्मोन्नति एवं ईश्वर-साक्षात्कार प्राप्त करने की प्रबल इच्छा|

परमहंस जी का कहना था कि क्रियायोग इस आधुनिक युग के लिए विशेष रूप से बनाया गया “धर्म” है | वे कहते थे कि आधुनिक युग में लोग विश्वास के आधार पर धर्म एवं ईश्वर को स्वीकार नहीं करेंगे | उन्हेंईश्वर के अस्तित्व एवं धर्म के औचित्य का प्रमाण चाहिए | और यह प्रमाण हर एक व्यक्ति अपनी ही चेतना में क्रिया योग के अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकता है | तब संदेह करने के लिए कुछ नहीं रह जाता | योगी कथामृत में वे लिखते हैं“जो लोग किसी भी मनुष्य केदेवत्व पर विश्वास नहीं कर सकते, वे क्रिया की कुंजी को प्रयुक्त कर अंततः स्वयं अपने में पूर्ण देवत्वका दर्शन करेंगे|”

महापुरुष लोगों को जोड़ते है, विविधता में एकता दर्शाते हैं|“वसुधैवकुटुम्बकम”के सत्य को पुनः स्मरण कराते हैं|

परमहंस जी के जीवन एवं शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण पहलू इस सत्य को उजागर करने का था कि सभी सच्चे धर्म एक ही ईश्वर, एक ही परम सत्य को प्रतिपादित करते हैं| परमहंस जी ने अपने प्रवचनों और शिक्षाओं के द्वारा विशेष रूप से यह निरुपित किया कि श्रीमद भगवतगीता में श्री कृष्ण द्वारा सिखाया गया योग विज्ञान एवं सनातन धर्म तथा बाईबल में जीसस क्राईस्ट द्वारा सिखाये गएआध्यात्मिकसिद्धांत एक समान है Autobiography of a Yogi के अलावा उनकी दो मुख्य पुसतकेहैंGod Talks with Arjuna (CommentryonBhagwadGita) तथा The Second Coming of Christ | इन दोनों पुस्तकों में परमहंस जी बहुत ही विस्तारसे, एक ऐसी अनोखी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं जिससे न केवल पाठक की संदेहात्मक बुद्धि को संतुष्टि मिलती है बल्कि हृदय को सांत्वनाऔर साहस भी मिलता है |

भारत में उनके द्वारा स्थापित संस्था, योगदा सत्संग सोसाइटीआफइंडिया, अपने 4आश्रमों एवं 200 से भी अधिक ध्यान केन्द्रोंके माध्यम से, उनके आदर्शों को आज भी जीवंत रखतीआ रहीहै|इनमेंसे कुछ“आदर्श एवं उदेश्य” इस प्रकार हैं:

  • मनुष्य को तीन प्रकार के कष्टों-शारीरिक रोग, मानसिक अशान्ति और आध्यात्मिक अज्ञान-से मुक्त करना|
  • “ सादा जीवन उच्च विचार” को प्रोत्साहित करना,तथा मानवजाति के मध्य उनकी एकता के शाश्वत आधार – ईश्वर से सम्बन्ध- की शिक्षा देकर बन्धुत्व की भावना का प्रचार करना|
  • बुराई पर भलाई से, दुःख पर आनंद से, क्रूरता पर दया से और अज्ञान पर ज्ञान से विजय पाना |
  • अपनी ही बृहद आत्मा (परमात्मा) के रूप से मानवजाति की सेवा करना |

वर्ष2017 में योगदा सत्संग सोसाइटी-ऑफ़ इंडिया अपनी स्थापना शताब्दी मना रही है | और इन शताब्दी समारोहो का उद्घाटन, परमहंस जी के जनम दिवस, 5जनवरी2017 को किया जा रहा है | शताब्दी वर्ष के दौरान योगदा के द्वारा पूरे भारत में अनेक ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जाने की योजना है जिसके द्वारा परमहंसजी का क्रिया योग का सन्देश घर-घर तक पहुंचे|साथ ही अनेक धर्मार्थ एवं लोक सेवा के कार्य भी शुरू किये जायेंगे |

परमहंस जी का जीवन एक उज्ज्वल सूर्य की भांति था जिसका प्रकाश पूरे विश्व में फैलता जा रहा है, औरअनेकव्यक्तियों के अज्ञान-तिमिर को दूर कर रहा है| योगी कथामृत के अंत में परमहंस जी ने ये उद्गार व्यक्त किये:

“पूर्व और पश्चिम में क्रिया योग का उदात्त कार्य अभी तो केवल शुरूही हुआ है | ईश्वर करे कि सब लोगोंको यह ज्ञात हो जाये की सारे मानवी दु:खोंको मिटा देने के लिए आत्मज्ञान की एकनिश्चित, वैज्ञानिक प्रविधिअस्तित्व में है|

“पृथ्वी पर तेजस्वी रत्नों की भांति चतुर्दिक बिखरे क्रियायोगियों को प्रेम की तरंगे भेजतेहुएमैंकृतज्ञ भाव से प्रायः सोचता हूँ:

“भगवन! आपने इस संन्यासी को इतना बड़ा परिवार दिया है!”

विश्वभर में फैले लाखोंक्रिया योगी जोपरमहंस जी को अपना गुरु मानते हैं, वे जगदगुरु केइसवाक्य को सिद्ध करते हैं|

परमहंस जी के ज्ञान-कोष से कुछ अनमोल रत्न :

  • “सब कुछ में विलम्ब कियाजा सकता है, परन्तुअपनीईश्वर की खोज में विलम्ब न होने दें|”
  • “प्रसन्नतादूसरोंको प्रसन्न करने में और निजी-स्वार्थ कोछोड़ कर दूसरोंको आनंद देने में निहित है |”
  • “आप जितना अधिक गहरा ध्यान करेंगे और जितनी अधिक स्वेच्छा से सेवा करेंगे उतने ही अधिक सुखी होंगे |”
  • “हम कहते हैंकिईश्वर हमें दिखाई नहीं देते, परन्तु वास्तव में वे इस महान प्रकट विश्व में दृश्यमानहैं| ईश्वर मात्र एक वस्तु नहीं हैं- वे सब कुछ हैं |”
  • स्वामी ईश्वरानंद गिरी (योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इंडिया ) द्वारा लिखा गया लेख