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संजय गांधी पीजीआई प्रशासन के खिलाफ रेजीडेंट्स डॉक्‍टरों में जबरदस्‍त रोष

-आंतरिक मूल्‍यांकन संबंधी डीन के आदेश पर भड़के रेजीडेंट्स

-संस्‍थान के निदेशक से मिलकर अपनी बात विस्‍तार से रखी

लखनऊ। वर्तमान कोरोना काल में जहां चिकित्‍सकों को योद्धा के रूप में पेश करके उन्‍हें सम्‍मान दिया जा रहा है, इसी दौर में देश के नामचीन संस्‍थानों में गिने जाने वाले लखनऊ के संजय गांधी पीजीआई में इन योद्धाओं की पीठ पर हाथ रखना तो दूर इनका मनोबल तोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। यहां पीजी/डीएम/एमसीएच जैसे उच्‍च चिकित्‍सा शिक्षा के कोर्स करने के लिए टॉप रैंकिंग वाले छात्रों को ही चुना जाता है, ऐसे मेधावी डॉक्‍टर्स अपने खिलाफ होने वाली साजिश को लेकर चिंतित है, उनकी चिंता अपने भविष्‍य को लेकर रोष में बदल रही है। फि‍लहाल इन रेजीडेंट्स ने संस्‍थान के मुखिया के पास अपनी फरियाद रखी है, और उन्‍हें उम्‍मीद है कि कुछ न कुछ सकारात्‍मक होगा, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि अगर उन्‍हें न्‍याय नहीं मिला तो वे अपनी लड़ाई हर उस स्‍तर तक ले जायेंगे जहां उन्‍हें न्‍याय की आस हो।

संजय गांधी पीजीआई की रेजीडेंट्स एसोसिएशन के अध्‍यक्ष डॉ आकाश माथुर और महामंत्री डॉ अनिल गंगवार ने रेजीडेंट्स की भावनाओं को व्‍यक्‍त करते हुए कहा कि वैसे तो देश तथा प्रदेश में कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए सभी डॉक्टर्स का ध्यान इसकी रोकथाम पर होना चाहिए, किंतु ऐसे वक्त में भी जब रेसिडेंट डॉक्टर्स अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहे हैं, वातानुकूलित प्रशासनिक दफ्तरों में बैठे लोग मेडिकल काऊंसिल ऑफ इंडिया के नियमों की भी धज्जियाँ उड़ाते हुए रेजीडेंट डॉक्टर्स का मनोबल तोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

उन्‍होंने बताया कि कुछ दिन पहले संजय गांधी पीजीआई में परीक्षा प्रणाली में सुधार व तंत्र को पारदर्शी बनाने की मांग उठी थी, अभी इस बाबत कोई ठोस कदम उठाया जाता उससे पहले ही तथाकथित रूप से तंत्र सुधार की आड़ में रेजीडेंट डॉक्टर्स पर अनुचित अनावश्यक दबाव बनाने के लिए एक नया नियम बनाया गया है। इस नियम के अनुसार अब हर 6 महीने में आंतरिक मूल्यांकन होगा  तथा लगातार दो आंतरिक मूल्यांकन में यदि संतोषजनक प्रदर्शन नहीं रहा तो रेजीडेंट को पीजी/डीएम/एमसीएच कोर्स से निष्कासित कर दिया जाएगा।

डॉ आकाश कहते हैं कि यहाँ बड़ा सवाल यह है कि जो छात्र राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा में टॉप रैंक लाकर संस्थान में भर्ती लेते हैं, क्या संस्थान एक आंतरिक परीक्षा लेकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा सकता है?  जो छात्र राष्ट्रीय स्तर पर शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं, क्या कारण है कि वह अचानक संस्थान में आते ही बिल्कुल हाशिए पर आ जाते हैं, ये भी कई महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनके जवाब दिए जाना जरूरी है।

उनका कहना है कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस तरह का कोई नियम नहीं बनाया है तथा आंतरिक मूल्यांकन कर व्यक्ति को संस्थान से निष्कासित करना संस्थान के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। आंतरिक मूल्यांकन सामान्य परिस्थिति में एक अच्छा कदम है किंतु वर्तमान हालात में यह अत्यंत अनावश्यक है। जब समस्त देश परीक्षाओं को हटा कोरोना की समस्या से निपटने में लगा है ऐसे में क्यों अचानक संजय गांधी पीजीआई प्रशासन को आंतरिक मूल्यांकन करने की नवचेतना जागृत हुई है यह किसी की भी समझ से परे है, यह ज़रूर हो सकता है  कि वातानुकूलित कमरे में बैठे ऐसे आदेश निकालने वाले प्रशासनिक अधिकारी शायद बाहरी दुनिया की दशा एवं पीड़ा से अनभिज्ञ हों। मज़े की बात यह है कि इस मूल्यांकन में विभागीय कार्य एवं आचरण का मूल्यांकन करने जैसे पहलू भी पहली बार जोड़े गए हैं जो शायद पीजीआई में पिछले दिनों रेजीडेंट्स द्वारा कुछ न्यायसंगत मुद्दों को लेकर उठायी गयी आवाज़ की परिणीति प्रतीत होते हैं। उनका मानना है कि मेडिकल कॉलेजों में तंत्र सुधारने के किसी भी प्रयास तथा प्रशासन को सुखद अनुभूति ना देने वाली हर आवाज़ को उद्दंडता की श्रेणी में ही गिना जाता है।

नेताद्वय का कहना है कि यहाँ कुछ बड़े सवाल यह भी उठते हैं:

1. क्या सिर्फ मूल्यांकन के बजाए प्रशिक्षण का स्तर सुधारने पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए ?

2. क्या निष्कासन का भय दिखाने के बजाए किस तरह से छात्रों को और बेहतर बनाया जाए इस पर चिंतन ज़रूरी नहीं ?

3. परीक्षा प्रणाली को और सुदृढ़ कैसे बनाया जाए ?

4. क्या हम रेजीडेंट डॉक्टर्स को नियमानुसार 8 घंटे ड्यूटी करा बाकी वक़्त पढ़ने के लिए दे रहे हैं जो हमसे एमसीआई  द्वारा तय मानकों से भी ज़्यादा अपेक्षा कर रहे हैं?

5. क्या हमारे कार्यक्षेत्र के वातावरण से लेकर रेजीडेंट डॉक्टर्स के रहने की व्यवस्था तक सब अनुकूल है ?

6. जहाँ संस्थान के पुस्तकालय में जर्नल्स और अन्य अध्ययन सामग्री धन के अभाव में उपलब्ध नहीं हो पा रही हो, वहाँ इस तरह की अपेक्षा क्या जायज़ है ?

7. एक ऐसे देश व प्रदेश में जहां बजट जैसे बड़े मुद्दों में भी प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री जनभागीदारी सुनिश्चित कर रहे हों वहाँ छात्रों से जुड़े बड़े बड़े मुद्दों पर फैसले अकादमिक बोर्ड द्वारा लिए जाने से पूर्व क्या छात्र प्रतिनिधियों को इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए ?

8. शिक्षण के स्तर का मूल्यांकन कैसे होगा ?

नेताद्वय का कहना है कि वक़्त आ गया है कि संस्थान प्रशासन अब समझे कि पीजी/डीएम/एमसीएच कर रहे छात्रों को पाँचवी कक्षा के हैडमास्टर की भाँति डंडे का जोर दिखाकर न तो पढ़ाया जा सकता है और न ही सिखाया जा सकता है, डराया तो बिल्कुल भी नहीं जा सकता। इन डॉक्‍टरों का कहना है कि इस समय ज़रूरत है छात्रों के अनुकूल वातावरण बनाये जाने की, नवीन शिक्षण पद्धतियों एवं माध्यमों को अपनाने की तथा स्वयं एक कुशल उदाहरण बन प्रशिक्षु चिकित्सकों को भी उन्हीं आदर्शों पर चलने हेतु प्रोत्साहित किए जाने की। उन्‍होंने कहा कि बहरहाल वर्तमान में डीन एसजीपीजीआई द्वारा निकाला गया यह आदेश बेहद बचकाना है, जो शायद ही किसी कोर्ट में 5 मिनट भी टिक पाए।