ऐसी नेत्र सर्जन, जो अपने नेत्रों में बुनती हैं काव्‍य का तानाबाना

-डॉ वंदना मिश्रा के हाइकु संग्रह ‘बोली बांसुरी’ का विमोचन

लखनऊ। शहर की साहित्यिक संस्था “काव्या सतत साहित्य यात्रा व शारदेय प्रकाशन के संयुक्त तत्वावधान में कवियित्री डॉ वंदना मिश्रा का हाइकु संग्रह “बोली बांसुरी” का कैफ़ी आज़मी अकादमी, लखनऊ में विमोचन हुआ। अभिव्यक्ति की कार्यकारी अध्यक्ष शारदा लाल की अध्‍यक्षता में आयोजित समारोह में पुस्‍तक का विमोचन हुआ।  

पेशे से आई सर्जन डॉ वंदना मिश्रा का लेखन का शौक बहुत पुराना है और उन्‍होंने अपनी मेडिकल की पढ़ाई के दौरान ही 1987 में, साहित्य के क्षेत्र में पदार्पण किया था, जब उनकी एक छंद मुक्त रचना पत्रिका “साप्ताहिक हिंदुस्तान” में प्रकाशित हुई थी। “विश्व पटल” पत्रिका के संपादक आर पी शुक्ला, निवेदिता और डॉ मिथिलेश दीक्षित के प्रति उन्होंने “बोली बांसुरी” के प्रकाशन के लिए विशेष आभार व कृतज्ञता ज्ञापित की।

भगवद्गीता से प्रभावित डॉ वंदना मिश्रा के इस हाइकु संग्रह में उनका श्री कृष्ण प्रेम यत्र-तत्र परिलक्षित होता है

यथा- सखी री होली/ मैंने जी भर खेली/ कृष्ण की हो ली!;

दुर्बल मन/आज फिर अर्जुन/गीता शरण,

पुस्तक में डॉ वंदना ने अपने जीवन दर्शन को भी संकेतित किया है —“जीवन क्रम/अंत के बाद आता/सदा आरंभ।”

वैश्विक महामारी कोरोना के संदर्भ में देखें, तो उपरोक्त हाइकु, जन मानस में नवीन आशा का संचार करने वाला है। विमोचन के दौरान कवियित्री ने अपना परिचय हाइकु से दिया “पहाड़ी नदी/शिलाओं को काटती/कब है रुकी।”

इस मौके पर मंच पर शारदेय प्रकाशन की संस्थापिका निवेदिता, उनके पिता कृष्णा नंदन वर्मा, साहित्यकार सीमा अग्रवाल ने भी मंच की महिमा बढ़ायी। कार्यक्रम में पुस्तक की समीक्षा करते हुए साहित्यकारों ने भी इसे खूब सराहा। समारोह में शहर के गणमान्य व्यक्तियों में डॉ विनी टण्डन, डॉ विनोद तिवारी, डॉ रुचि श्रीवास्तव एवं डॉ कुमुद श्रीवास्तव भी उपस्थित थीं।