महिला मरीज को कभी भी अकेले में न देखें डॉक्‍टर, न ही की जाये अकेले में जांच

-मेडिकल एथिक्‍स फॉर फीमेल पेशेन्‍ट्स विषय पर व्‍याख्‍यान में प्रो विनोद जैन ने दी सलाह  

-ऑनलाइन व्‍याख्‍यान के आयोजन से केजीएमयू में शुरू हुआ महिला सुरक्षा सप्ताह

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) के पैरामेडिकल विज्ञान संकाय के अधिष्‍ठाता व सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ विनोद जैन, ने सलाह दी है कि जब भी महिला रोगी उपचार या निदान कराने आए तो उसके साथ एक महिला का उपस्थित होना आवश्‍यक है। यदि महिला उपलब्ध नहीं है तो पति इस दौरान उपस्थित रहना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि जहाँ तक संभव हो आकस्मिक सेवा में भी इस नियम का पालन करना चाहिए।

प्रो जैन ने यह बात के.जी.एम.यू इंस्टीट्यूट ऑफ पैरामेडिकल साइंसेज के तत्वावधान में महिला छात्र/छात्राओं एवं अध्यापिकाओं की सहभागिता एवं सुरक्षा के लिए आयोजित किये जा रहे महिला सुरक्षा सप्ताह (17 अक्टूबर से 25 अक्टूबर तक) का शुभारम्‍भ करते हुए मेडिकल एथिक्‍स फॉर फीमेल पेशेन्‍ट्स पर अपने व्‍याख्‍यान में कही। इसका आयोजन उत्तर प्रदेश सरकार एवं महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा की मंशानुरूप किया गया है। विषय पर बोलते हुए प्रो जैन ने कहा कि प्राय: देखा गया है कि महिलाएं, चाहें वे ग्रामीण क्षेत्र की हों अथवा शहरी क्षेत्र की, उनका हर स्तर पर उत्पीड़न होता है। चाहे उनकी गोपनीयता हो उनकी गरिमा।

आज के कार्यक्रम में महिला रोगियों के लिए चिकित्सा नैतिकता (मे‍डिकल एथिक्‍स) पर ऑनलाइन लेक्‍चर एवं छात्राओं/अध्यापिकाओं  की प्रतिभागिता सुनिश्चित की गयी। प्रो जैन ने कहा कि मेडिकल एथिक्‍स के मूलभूत आधार होते हैं स्वायत्तता, लाभ, हानिर‍हित, न्याय, गोपनीयता, सूचित सहमति (Autonomy, Beneficence, Non-Maleficence, Justice, Confidentiality, Informed consent)। इसके बारे में डॉ विनोद जैन ने बताया कि महिला मरीजों के बारे में बात की जाये तो स्‍वायत्‍तता यानी मरीज को इलाज व जांच कराने में चुनाव करने की पूरी छूट होनी चाहिये, उदाहरण के लिए ऑपरेशन के लिए ओपन और लैपोस्‍कोपी दो तरह की विधियां हैं, उसे किस विधि से सर्जरी करानी है इसका निर्णय लेने की मरीज को पूरी आजादी है। इसी प्रकार लाभ का अर्थ है चिकित्‍सक को चाहिये कि वह ऐसा कार्य करे जो मरीज को लाभ देने वाला हो, इसी प्रकार चिकित्‍सक को ऐसा कार्य करना है जो मरीज को हानि न पहुंचाये जैसे मरीज को अगर किसी उपचार से नुकसान हो सकता है, तो ऐसे में चिकित्‍सक को उस कार्य को नहीं करना है, भले ही मरीज कहे कि मेरी जिम्‍मेदारी है, मैं तैयार हूं। इसके अलावा न्‍याय से तात्‍पर्य इस बात से है कि चिकित्‍सक को चाहिये कि वह मरीजों के इलाज में भेदभाव न बरते, अर्थात उसके लिए आम हो या खास सभी मरीज एक समान हैं, उसे सभी की चिकित्‍सा करनी है। इसी प्रकार महिला को कोई ऐसी गंभीर बीमारी है कि उसकी गोपनीयता को बरकरार रखना है। इसके अलावा रोग और उपचार के बारे में मरीज को पूरी जानकारी देते हुए उसकी स‍हमति से ही उसका इलाज करना चाहिये।     

प्रो जैन ने कहा कि बहुधा यह देखा गया है कि महिला संकोच के कारण अपनी बात ठीक से नहीं कह पाती अथवा रोगों को बढ़ा लेती हैं। यदि उनको उत्पीड़न होता भी है तो उनकी शिकायत अन्य लोगों से नहीं करती। इस विषय के लिए जागरुकता की आवश्‍यकता है। हर महिला को यह अधिकार है कि वे किसी भी चिकित्सक के पास इलाज या निदान करते समय एक महिला की उपस्थिति को अनिवार्य रुप से उपलब्ध कराने को कहें और यदि किसी भी वजह से महिला मरीज को किसी प्रकार की शिकायत हो तो बिना किसी झिझक के उसकी रिपोर्ट करें। सरकार द्वारा भी इसको पालन करने के लिए निर्देश दिए जा चुके हैं।

अंत में डॉ विनोद जैन ने सभी छात्राओं/अध्यापिकाओं का आवाहन करते हुए बताया कि वे इस जानकारी को अपने स्तर से अन्य महिलाओं में भी फैलाएं और स्वयं भी इस बात का ध्यान रखें कि किसी भी महिला रोगी के उपचार एवं परीक्षण के दौरान एक महिला की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। इस कार्यक्रम को 176 छात्राओं/अध्यापिकाओं ने सजीव देखा एवं अपनी जिज्ञासाओं को शान्त किया।

इस कार्यक्रम को सफल संचालन शालिनी गुप्ता, मंजरी शुक्ला एवं शिवांगी श्रीवास्तव द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य रुप से वीनू दुबे, रचना वर्मा एवं पैरामेडिकल विज्ञान संकाय के अन्य महिला कर्मी भी उपस्थित रहे।