Monday , November 28 2022

मन, कर्म व वचन का मंत्र हो हाथ, तो सफलता रहेगी साथ

केजीएमयू के नेत्र विज्ञान विभाग में आयोजित प्रो एमके मेहरा व्‍याख्‍यान में बताया गया ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’

प्रो गिरीश्वर मिश्रा

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो गिरीश्वर मिश्रा ने जीवन में संतुलित मनसा, वाचा, कर्मा का महत्‍व बताते हुए कहा है कि मानव कारवां अपनी प्रगति के अहंकारी गौरव के साथ आगे बढ़ रहा था, लेकिन फि‍र कोविड-19 महामारी आयी और उसने मानव की मनमानी पर ब्रेक लगा दिये। ऐसे समय में मन की भूमिका बहुत महत्‍वपूर्ण साबित हुई। इसलिए हमें समझना होगा कि संतुलित मनसा, वाचा, कर्मणा का मंत्र ही हमारे जीवन के लिए बेहतर है। जब हम मन से हारकर विवेक खो देते हैं तो परेशानियां हावी हो जाती हैं लेकिन जब हम मन को मजबूत करते हैं तो यह हमें बेहतरी की ओर ले जाता है।

प्रो गिरीश्‍वर मिश्र ने ये विचार आज यहां किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) के नेत्र विज्ञान विभाग में आयोजित 12वें प्रो एमके मेहरा व्‍याख्‍यान समारोह के मौके पर अपने व्‍याख्‍यान में व्‍यक्‍त किये। यह जानकारी देते हुए नेत्र रोग विभाग की विभागाध्‍यक्ष प्रो अपजित कौर ने बताया कि आज के कार्यक्रम के मुख्‍य अतिथि के रूप में कुलपति कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन पुरी रहे। कुलपति ने अपने सम्‍बोधन में आज के व्‍याख्‍यान के विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि मन की सोच हमारे जीवन पर अच्‍छा या बुरा प्रभाव डालती है। इसलिए हमें अपनी सोच को ही अच्‍छी दिशा की ओर रखना है। क्‍योंकि जैसा हम सोचेंगे वैसा ही करेंगे और जैसा करेंगे वह कर्म ही हमारा भाग्‍य तय करेगा।

प्रो कौर ने बताया कि यह व्याख्यान नेत्र विज्ञान के विख्यात चिकित्सक और विभाग के पूर्व प्रमुख प्रो एमके मेहरा की स्मृति में एक वार्षिक कार्यक्रम था। उन्‍होंने बताया कि व्याख्यान महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्रा, पीएच.डी. द्वारा दिया गया।

प्रो मिश्रा ने माइंड मैटर्स पर बात की। इसका विषय था ‘आइये महामारी को हराने के लिए हाथ मिलाएं’। उन्‍होंने बताया कि व्‍याख्‍यान का इस इस वर्ष का विषय मनोवैज्ञानिक ताकत और पैटर्न की भूमिका पर केंद्रित था, जो COVID 19 महामारी से संबंधित है।

अपने व्‍याख्‍यान में प्रो मिश्रा ने कहा कि जिस प्रकार प्रगति के अहंकारी गौरव से भरे मानव कारवां को कोविड-19 ने रोका, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि मन सभी बंधनों से मुक्त होने और मुक्त करने के लिए अर्थ देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, जिसकी सहायता से हमारा जीवन चलता है। यह मन है जिसने हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसका कोई रूप नहीं होता है, लेकिन यह स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।

उन्‍होंने कहा कि मन,बुद्धि,अहंकार की सहायता से चलता रहता है, हमें सुख-दुःख का अनुभव कराता है। जब मन बाहरी दुनिया के तूफानों में अपना विवेक खो देता है, तब अनावश्यक परेशानियां हावी हो जाती हैं। लेकिन जब यह मन हमें विभिन्न चुनौतियों में मजबूत रहने की शक्ति देता है, तो हम विश्वगुरु बन जाते हैं। यह अहंकार और अभिमान से परे है, सभी के साथ, इच्छाशक्ति की दृढ़ता के साथ, मानसिक शक्तियां कई शारीरिक और मानसिक विपत्तियों को दूर करती हैं। इसलिए संतुलित मनसा, वाचा, कर्मणा का मंत्र हमें बेहतरी की ओर ले जाता है। उन्होंने चर्चा की कि कैसे चेतना के साथ संबंध हमें स्वस्थ और भयमुक्त रख सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

5 × 2 =

Time limit is exhausted. Please reload the CAPTCHA.