बच्चे को ‘छुई-मुई’ न बनाइये, थोड़ा बहुत मिट्टी में भी खेलने दीजिये

लखनऊ। अगर आपका बच्चा मिट्टी में खेल रहा है तो उसे रोके नहीं, खेलने दें। यह सुनकर आपको बहुत अजीब लग रहा होगा, लेकिन यह सच है, और यह हम नहीं कह रहे, यह कह रहे हैं संजय गांधी पीजीआई के गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के प्रो. यूसी घोषाल। दरअसल इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के लिए यह भी जरूरी है। इम्यून सिस्टम मजबूत रहेगा तो बच्चा दूसरी बीमारियों से लड़ सकेगा। बच्चे को ‘छुई-मुई’ न बनाइये, ज्ञात हो छुई-मुई या मिमोसा पुडिका का एक पेड़ होता है जिसकी पत्तियों को छूने मात्र से वह मुरझा जाता है।

प्रो. यूसी घोषाल

एक्स्ट्रा हाईजीन में रखना भी है खतरनाक

शुक्रवार को वर्ल्ड इन्फ्लामेट्री बाउल डिजीज डे है। इस मौके पर पीजीआई में आयोजित एक कार्यशाला में प्रो घोषाल ने बताया कि बच्चे को गंदगी से बचाना जरूरी है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जरूरत से ज्यादा यानी उसे एक्स्ट्रा हाईजीन में रखा जाये, ऐसा किया तो वह उल्टा बीमार पड़ जायेगा, वह पेट की बीमारी क्रोन्स का शिकार हो सकता है।

पार्कों में भी खेलने नहीं जाने देते बच्चों को

प्रो घोषाल ने कहा कि यह देखा गया है कि आजकल माता-पिता अपने बच्चों को पार्क में खेलने नहीं भेजते हैं, उन्हें डर रहता है कि उनका बच्चा वहां धूल-मिट्टी में खेलेगा तो बीमार पड़ जायेगा। लेकिन ऐसा करने से जहां बच्चे सबसे मिलने-जुलने से वंचित हो रहे हैं वहीं धूल-मिट्टी से भी दूर होते जा रहे हैं। होता यह है कि अच्छे बैक्टीरिया बच्चों की आहार नली में पहुंच ही नहीं पाते हैं, बल्कि जो अच्छे बैक्टीरिया आहार नली में पहले से हैं वे भी इन बच्चों को देने वाली एंटीबायटिक दवाओं से मर जाते हैं। ऐसे में उन्हें पेट की बीमारी क्रोन्स तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रही है। इनकी एक्स्ट्रा केयर ही इनके लिए मुसीबत बन जाती है।

क्रोन्स बीमारी के शिकार हो रहे

इन बच्चों में हो रही क्रोन्स की बीमारी के बारे में प्रो घोषाल ने बताया कि इस बीमारी में बच्चों का वजन कम होना, पेट में गांठ, बुखार, आंतों में अल्सर होना, मल के साथ खून आना जैसी शिकायतें सामने आती हैं। उन्होंने बताया कि इस रोग में इम्यून सिस्टम आमाशय छोटी आंत, बड़ी आंत मेंं एंटी बॉडी बनाने लगता है, जिससे जगह-जगह घाव हो जाते हैं। उन्होंने बताया कि इस बीमारी के बढऩे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपने भारत देश में ही हर साल करीब साढ़े सात लाख नये मरीज आ रहे हैं।

अभी सिर्फ लक्षणों के आधार पर हो रहा इलाज

प्रो. घोषाल ने बताया कि क्रोन्स बीमारी का पता लगाने के लिए अभी न ही कोई जांच है और न ही कोई इलाज। चिकित्सक छोटी-बड़ी आंत की बायप्सी कर ट्यूबरकुलोसिस यानी टीबी की जांच कराते हैं, और अगर टीबी नहीं निकली तो दूसरे लक्षणों के आधार पर मरीज का इलाज करते हैं। अभी चिकित्सक ऐसे रोग के करीब 80 प्रतिशत मरीजों को टीबी की दवा देते रहते हैं। उन्होंने कहा कि कई बार चिकित्सक ब्लड आने पर पाइल्स की दवा देते रहते हैं। प्रो घोषाल ने सलाह दी कि इन दवाओं से कोई राहत न मिले तो मरीज को सुपरस्पेशियलिटी चिकित्सालय में दिखाना चाहिये।

बोतलबंद पानी से कहीं बेहतर है हैंडपम्प का पानी

प्रो. घोषाल ने कहा कि आजकल बोतलबंद पानी का प्रचलन बढ़ गया है और हैंडपम्प का पीने वाले लोग कम हो गये हैं। उन्होंने कहा कि जबकि देखा जाये तो बोतल बंद पानी की तुलना में हैंडपम्प का पानी कहीं ज्यादा बेहतर है। हैंडपम्प के पानी से पेट भी ठीक रहता है और डिहाईडे्रशन की संभावना भी कम होती है।
उन्होंने बताया कि इस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए www.spreadhealth.in पर जानकारी अपलोड की गयी है।