हैनीमैन जयंती पर विशेष : होम्योपैथी के प्रकाश को विश्व में फैलाने का प्रयास

जीवन की उत्पत्ति के साथ ही रोगों का जन्म हुआ और रोगों के साथ ही उसके उपचार के तरीकों की खोज प्रारम्भ हो गई। विश्व के अलग-अलग हिस्सों में रोगों के उपचार की विभिन्न पद्धतियों का अविष्कार हुआ। कुछ पद्धतियां सामाजिक स्वीकृति के अभाव में अपना अस्तित्व खोती चली गई और कुछ अपने गुणों एवं विशिष्टताओं के बल पर अपना स्थान बनाती चली गई। होम्योपैथी विश्व में प्रतिस्थापित चिकित्सा पद्धतियों में दूसरे स्थान पर लोकप्रिय एवं अपनाई जाने वाली पद्धति है जो लगभग 200 वर्षों से अधिक समय से जनस्वास्थ्य का विकल्प बनने की ओर अग्रसर है।

डॉ हैनीमैन जयंती (10 अप्रैल) पर डॉ. अनुरुद्ध वर्मा का लेख

होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति का आविष्कार डॉ. हैनीमैन ने सन् 1790 में सम सम: समयति के सिद्धांत के आधार पर जर्मनी में किया था। डॉ. हैनीमैन एक ख्याति प्राप्त एलोपैथिक चिकित्सक थे और उन्होंने तत्कालीन प्रचलित उपचार की पद्धति में व्याप्त कमियों को दूर करने के लिये व्यापक परीक्षणों, अनुभवों एवं शोधों के बाद होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया। डॉ. हैनीमैन द्वारा प्रतिपादित सिमिलिया, समिलिबस, क्यूरेंटर का दर्शन विश्व चिकित्सा विज्ञान का सबसे आधुनिक दर्शन है इस चिकित्सा दर्शन ने विश्व को एक नया चिकित्सा दर्शन दिया है जिसका कोई विकल्प नहीं है। होम्योपैथी ने विश्व स्वास्थ्य मिशन को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है जिसका परिणाम आज हमारे सामने है और होम्योपैथी आज विश्व के 90 से अधिक देशों में लोकप्रियता के शिखर पर है इन देशों में मुख्य रूप से दक्षिणी और उत्तरीय अमेरिका, वैनेजुएला, अर्जेटाइना, जर्मनी, यूक्रेन, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, यूएसए, फ्रांस, रूस आदि देश शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि भारत, श्रीलंका, ब्रिटेन, पाकिस्तान आदि देशों में होम्योपैथी को राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल किया जा चुका है। एक अनुमान के अनुसार विश्व में लगभग 14 प्रतिशत से अधिक लोग होम्योपैथी पद्धति द्वारा अपने रोगों का उपचार कराने में विश्वास रखते है। दुनिया में होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि होम्योपैथिक औषधियों का वर्तमान विश्व बाजार 135 बिलियन रूपये से अधिक का है तथा वार्षिक वृद्धि दर लगभग 25 प्रतिशत है। फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री जहां 13 से 15 प्रतिशत की गति से वृद्धि कर रही है वहीं पर होम्योपैथी का बाजार 25 से 30 प्रतिशत की गति से आगे बढ़ रहा है। मार्केट रिसर्च ग्रुप मिंटेल के अनुमान के अनुसार होम्योपैथी का 2012 तक मार्केट 46 मिलियन पाउड था। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है पिछले 40 वर्षों में जितने भी अध्ययन हुये है उनमें होम्योपैथिक औषधियों का अन्य पद्धतियों की औषधियों के बराबर और कुछ क्षेत्रों में अधिक प्रभावी पाया गया है।
होम्योपैथी की लोकप्रियता का अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता हे कि होम्योपैथी अपने जन्म के लगभग 200 वर्षों के भीतर ही समुद्र की गहराइयों को पार कर के दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में फैलकर जन स्वास्थ्य का विकल्प बनने की ओर अग्रसर है इसका मुख्य कारण है होम्योपैथी का पूर्णरूपेण वैज्ञानिक आधार, सौम्य औषधियाँ, रोगी के प्रति संवेदनशीलता एवं विषाक्तता रहित तथा संपूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने का गुण है। ध्यान देने योग्य यह है कि विश्व की अन्य कोई चिकित्सा पद्धति ऐसी नहीं है, जिसकी औषधियाँ या उपचार विधि इतनी सरल, सौम्य, सुरक्षित पीड़ामुक्त एवं विषाक्तता या दुष्प्रभाव रहित हो। इसके साथ ही दुनिया में प्रचलित अन्य चिकित्सा पद्धतियों में से किसी के दर्शन लिखित एवं निश्चित नहीं है। होम्योपैथी ही एकमात्र चिकित्सा पद्धति है जिसका दर्शन एवं सिद्धांत निश्चित है तथा होम्योपैथी ही एकमात्र पद्धति है जिसमें रोगी के आचार-विचार, व्यवहार, शारीरिक बनावट, व्यवहार से लेकर उसके मनोभवों एवं व्यक्तित्व को दृष्टिगत रखते हुये औषधि का चयन कर उसको पूर्ण स्वास्थ्य प्रदान किया जाता है। होम्योपैथी की सबसे बडी विशेषता यह है कि रोगी का उपचार प्रारंभ करने के लिये किसी तामझाम एवं ज्यादा जांचों की जरूरत नहीं होती है। आज पूरी दुनिया  में एलोपैथिक इलाज जहाँ गरीबों की पहुंच से दूर होता जा रहा है वहीं पर अपेक्षाकृत कम खर्चीला होने के कारण होम्योपैथिक इलाज आम लोगों की पहुंच में है। मात्र होम्योपैथी औषधियाँ ही ऐसी हैं जो आम आदमी में महंगी दवाओं के जाल से निकाल सकती है।
भारत विश्व में होम्योपैथी की राजधानी है जहाँ लगभग 3 लाख पंजीकृत होम्योपैथी चिकित्सक चिकित्सा कार्य कर रहे है लगभग 10 हजार सरकारी होम्योपैथिक डिस्पेंसरियाँ 300 से अधिक होम्योपैथिक चिकित्सालय, लगभग 200 मेडिकल कालेज एवं 600 से अधिक दवा निर्माण इकाइयाँ स्थापित है तथा लगभग 13000 से अधिक छात्र प्रतिवर्ष होम्योपैथी कालेजों में प्रवेश लेते है। होम्योपैथिक शिक्षा के मानकों को निर्धारित करने, उनको लागू कराने, होम्योपैथिक चिकित्सकों का केन्द्रीय रजिस्टर बनाने तथा होम्योपैथिक चिकित्सकों के लिए आचार संहिता बनाने आदि कार्यों के लिये केन्द्रीय होम्योपैथिक परिषद स्थापित है। होम्योपैथिक में नये-नये शोध कार्य करने तथा होम्योपैथी में वैज्ञानिक तथ्यों को प्रमाणित करने के लिये केन्द्रीय होम्योपैथिक अनुसंधान परिषद स्थापित है।
विश्व में होम्योपैथी की सर्वाधिक लोकप्रियता भारत में है इसलिये हमारी जिम्मेदारी भी सबसे अधिक है। होम्योपैथी जैसी महत्वपूर्ण लोककल्याण से जुड़ी संपूर्ण स्वास्थ्य प्रदान करने वाली चिकित्सा पद्धति के प्रति पूरे विश्व में चेतना विकसित करने एवं डॉ. हैनीमैन के चिकित्सा दर्शन एवं सिद्धांत को पूरी दुनिया के समक्ष प्रचारित’-प्रसारित करने का समय आ गया है। आज यह कहने में संकोच नहीं किया जाना चाहिये कि विश्व में बिना होम्योपैथी के संपूर्ण स्वास्थ्य की कल्पना किया जाना संभव नहीं है।
होम्योपैथी ने अपने आविष्कार के लगभग 200 वर्षों के अंतराल में रोगमुक्त समाज की स्थापना के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की हैं परन्तु अभी भी होम्योपैथी की सेवाओं में विस्तार की असीम संभावनाएं विद्यमान है विशेषकर विकासशील देशों में जहां संसाधनों की समस्या है, जनता का आर्थिक स्तर निम्न है वहाँ होम्योपैथी की महत्ता और अधिक बढ़ जाती है। चिकित्सा के क्षेत्र में डॉ. हैनीमैन द्वारा प्रतिपादित सार्वभौमिक दर्शन एवं सिद्धांत के प्रति चेतना जागृत करने का समय आ गया है क्योंकि डॉ. हैनीमैन ने विश्व को एक ऐसी चिकित्सा पद्धति का वरदान दिया है जिसका कोई विकल्प नहीं है।
प्रेरणात्मक व्यक्तित्व की उपलब्धियों, राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय समस्याओं के समाधान, विशिष्ठ विचारों एवं दर्शन तथा सिद्धांत के प्रति जन  चेतना विकसित करने के लिये अनेक विश्व दिवसों का आयोजन किया जा रहा है। उदाहरणार्थ विश्व स्वास्थ्य दिवस, विश्व तम्बाकू निषेध दिवस, विश्व एड्स दिवस, विश्व अहिंसा दिवस, विश्व हृदय दिवस, विश्व मधुमेह दिवस, विश्व पर्यावरण दिवस, विश्व महिला दिवस आदि। विश्व स्तर पर एक दिवस विशेष पर चर्चा करके उस विषय विशेष के सम्बन्ध में जन चेतना उत्पन्न करना ही उस विश्व दिवस के आयोजन का महत्वपूर्ण उद्देश्य होता है।
होम्योपैथी के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिये आवश्यक है कि वर्ष का एक दिन होम्योपैथी के जनक को समर्पित किया जाये। डॉ. हैनीमैन के प्रति सम्मान एवं होम्योपैथी के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के लिये डॉ. हैनीमैन के जन्म दिवस 10 अप्रैल से अच्छा कोई अन्य दिवस हो ही नहीं सकता। अत: 10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाया प्रासंगिक एवं अनिवार्य है।
डॉ. हैनीमैन का जन्म 10 अप्रैल 1755 को जर्मनी में हुआ था। विश्व होम्योपैथी दिवस की प्रासंगिकता एवं औचित्य को स्वीकार करते हुये केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद ने डॉ. हैनीमैन की जयंती 10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाने का आवाह्न किया है। होम्योपैथिक चिकित्सकों की अन्तर्राष्ट्रीय संस्था एल0एम0एच0आई0 ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार किया है। भारत सरकार भी इस प्रस्ताव का पूरी तरह समर्थन कर रही है। विश्व होम्योपैथी दिवस 10 अप्रैल को सारे दुनिया के होम्योपैथिक चिकित्सकों को समारोह पूर्वक मनाना चाहिये तथा होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति की विशिष्टताओं एवं गुणों को आम जनता तक पहुंचाने, होम्योपैथी में नये-नये शोध करने, होम्योपैथी को पूरा विश्व में पहुंचाने एवं उसे जन स्वास्थ्य का विकल्प बनाने के लिये पहल करनी चाहिये तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन, भारत सरकार, अन्य देशों तथा होम्योपैथी के क्षेत्र में राष्ट्रीय एवं अन्र्तराष्ट्रीय स्तर पर कार्यरत संगठनों को भी विश्व होम्योपैथी दिवस मनाने के लिये कदम उठाना चाहिये।
आइये होम्योपैथी से जुड़े हम सभी लोग डॉ. हैनीमैन जयंती 10 अप्रैल को विश्व होम्योपैथी दिवस के रूप में मनाने का संकल्प ले तथा डॉ. हैनीमैन के चिकित्सा दर्शन एवं सिद्धांत के प्रकाश को पूरी दुनिया में फैलाकर निरोग विश्व निर्माण के सपने का साकार करें।

डॉ. अनुरुद्ध वर्मा
                                                                                                          सदस्य, केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद
                                                                                                          मो0- 9415075558