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दिमागी बुखार में मिल रहे स्क्रब टाइफस के मरीज

लखनऊ। दिमागी बुखार यानी एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम ( एईएस) के मरीजों में जहां सरकार द्वारा बचाव के लिए टीका लगाये जाने से जैपनीज इंसेफ्लाइटिस के मरीजों की संख्या घट रही है वहीं एईएस ग्रुप के मरीजों में ऐसे मरीज आ रहे हैं जिनमें स्क्रब टाइफस की शिकायत मिल रही हैंं। एक मोटे अनुमान के अनुसार एईएस के लगभग 30 से 40 प्रतिशत मरीजों में स्क्रब टाइफस रोग होने का पता चल रहा है। स्क्रब टाइफस घुन जनित रोग है और यह एक प्रकार के कीड़े के काटने से होता है। इसका उपचार सम्भव है। सामान्य तौर पर स्क्रब टाइफस का बुखार 7 से 14 दिनों तक रहता है।
यह जानकारी आज यहां अपर निदेशक नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम डॉ पीके सेन ने किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय केजीएमयू के माइक्रो बायोलॉजी विभाग के तत्वावधान में एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम पर आयोजित सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) कार्यक्रम में दी।  इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए विभागाध्यक्ष प्रो अमिता जैन ने बताया कि विशेषकर गरमी और बारिश के मौसम में यदि किसी व्यक्ति को बुखार आये और साथ में शरीर पर चकत्ते पड़ रहे हों, गफलत के बाद बेहोशी छा रही हो, सिरदर्द हो, झटके आयें, मिर्गी के दौरे, हाथ-पैर मुड़ रहे हों तो इन लक्षणों को सामान्य न मानकर तुरंत चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिये। उन्होंने बताया कि बीमारी का असर लिवर व गुर्दों पर भी पड़ता है।
एक्यूट इंसेफ्लाइटिस सिंड्रोम पर सीएमई आयोजित
प्रो जैन ने बताया कि आज की सीएमई में लखनऊ के साथ ही बाहर के विशेषज्ञों ने भी हिस्सा लिया। इनमें अपर निदेशक नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम डॉ पीके सेन, एसजीपीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो टीएन ढोल सहित केजीएमयू के कई विशेषज्ञों ने वक्तव्य दिया।
टीकाकरण से कम हुए हैं जैपनीज इंसेफ्लाइटिस के मरीज
प्रो रश्मि कुमार ने बताया कि जैपनीज इंसेफ्लाइटिस की निगरानी के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा एईएस शब्द गढ़ा गया। उन्होंने बताया कि दिमाग में वायरल और नॉन वायरल किसी भी कारण से दिमागी बुखार को एईएस कहा जाता है। लखनऊ में हर साल लगभग 400 बच्चे एईएस से ग्रस्त आते हैं, इनमें ज्यादातर मरीज पूर्वी जिलों से आते हैं। उन्होंने बताया कि 80 और 90 के दशक में पूर्णतया: न्यूरोलॉजिकल सिंड्रोम से पीडि़त बच्चों में 23 प्रतिशत में जेई यानी जैपनीज इंसेफ्लाइटिस पाया जाता था। हालांकि अब 1 से 15 साल तक के बच्चों में टीकाकरण किये जाने से इसके रोगियों में काफी कमी आयी है।
केजीएमयू के मेडिसिन विभाग के डॉ केके सावलानी ने बताया कि दिमाग की पैरेन्काइमा में बुखार से सूजन, चेतना में प्रत्यावर्तन, उद्वेग और फोकल न्यूरोलॉजिकल लक्षण इंसेफ्लाइटिस की ओर डाइगनोसिस करता है। इसकी जांच के लिए न्यूरोइमैजिंग, सीएसएफ और ईईजी कराया जाता है।
कार्यक्रम में आयोजन की चेयरपर्सन प्रो अमिता जैन ने बताया कि एईएस मुख्यत: आसाम, बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक पाया जाता है। इन प्रदेशों में देश के 80 फीसदी एईएस के केस देखने को मिलते हैं। आयोजन सचिव डॉ पारुल जैन ने बताया कि भारत में एईएस का मुख्य कारण वायरस है, जबकि बैक्टीरिया, फंगस, पैरासाइट्स, स्पाइरोकेट्स, केमिकल और विषाक्त पदार्थों को भी पिछले कुछ समय से एईएस फैलाने के लिए जिम्मेदार देखा जा रहा है।
कार्यक्रम में प्रो यूबी मिश्रा, प्रो अरुण चतुर्वेदी, प्रो मधुमति गोयल, डॉ डी हिमांशु, डॉ प्रशान्त गुप्ता सहित विभिन्न विभागों के चिकित्सक व छात्र-छात्राएं शामिल रहे।

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