गर्भधारण करते ही जरूरी है डायबिटीज की जांच

प्रो वीके श्रीवास्तव

लखनऊ। गर्भ धारण करने की पुष्टि होते ही स्त्री की डायबिटीज की जांच जरूर करानी चाहिये क्योंकि अगर गर्भवती को डायबिटीज है और उस पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो इसका असर होने वाले बच्चे पर पड़ेगा। डायबिटीज से ग्रस्त बच्चे का वजन ज्यादा होगा जिससे डिलीवरी के समय दिक्कत आ सकती है। बच्चे में जन्मजात बीमारियां हो सकती हैं।

भारत सरकार ने भी जारी कर रखी है गाइड लाइन

यह जानकारी हिन्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अटरिया सीतापुर के डिपार्टमेंट ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन के प्रमुख प्रो वीके श्रीवास्तव ने दी। वह आज यहां किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के उच्चीकृत कम्युनिटी मेडिसिन एंड पब्लिक हेल्थ के 59वें स्थापना दिवस पर आयोजित प्रो बीसी श्रीवास्तव ओरेशन प्रस्तुत कर रहे थे। ओरेशन के विषय गर्भावस्था में डायबिटीज के बारे में प्रो वीके श्रीवास्तव ने कहा कि भारत सरकार ने भी यह गाइड लाइन जारी की हुई है कि प्रत्येक गर्भवती का गर्भावस्था की शुरुआत में ही ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट जरूर कराया जाये। इसमें जिस गर्भवती को पहले से डायबिटीज नहीं हैं उसे ग्लूकोज पिलाकर टेस्ट कराना चाहिये। उन्होंने कहा कि इस गाइडलाइन के व्यापक प्रचार प्रसार की जरूरत है और जरूरत इस बात की भी है कि इसे एएनएम, आशा स्तर तक भी समझाया जाये वे गर्भवती का डायबिटीज टेस्ट जरूर करायें।

कुछ में सिर्फ गर्भावस्था के दौरान रहती है डायबिटीज

प्रो श्रीवास्तव ने कहा कि अगर गर्भवती डायबिटीज से ग्रस्त निकलती है तो जांच रिपोर्ट के आधार पर तय किया जाता है कि इसकी डायबिटीज का कंट्रोल खानपान से ही किया जाना है या फिर दवाओं से किया जायेगा। उन्होंने बताया कि अगर किसी की डायबिटीज ज्यादा है तो उसका बेहतर कंट्रोल इंसुलिन के इंजेक्शन से ही करना चाहिये। उन्होंने यह भी बताया कि यह जरूरी नहीं है कि डिलीवरी के बाद भी इंसुलिन लगानी पड़े। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत सी गर्भवती स्त्रियों में डायबिटीज डिलीवरी के बाद अपने आप ठीक भी हो जाती है।

डायबिटीज रही तो वजनदार हो सकता है शिशु

उन्होंने बताया कि यदि गर्भवती माता को डायबिटीज है तो बच्चा भी ज्यादा वजन का होगा ऐसे में डिलीवरी के समय उसके फंसने की आशंका होती है फिर सिजेरियन करना आवश्यक हो जाता है। फंसने की वजह से बच्चे की कोई नस दब गयी तो उसे पैरालिसिस हो सकता है। यही नहीं ऐसे में गर्भपात होने का भी डर बना रहता है।
इस अवसर पर समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो दीपक मालवीय तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में प्रो अरुण चतुर्वेदी व सीएमस डॉ यूबी मिश्रा उपस्थित रहे। कार्यक्रम के आयोजन के संरक्षक विभागाध्यक्ष प्रो उदय मोहन ने बताया कि विभाग की स्थापना का शासनादेश 26 दिसम्बर, 1957 को हुआ था तथा इसकी स्थापना 15 मार्च, 1958 को हुई थी। उन्होंने बताया कि इसके अच्छे कार्यों की वजह से विभाग का उच्चीकरण 1972 में किया गया। यहां दी जाने वाली उच्च शिक्षा का विस्तार राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहा है। उन्होंने बताया कि विभाग में एमबीबीएस, एमडी, डीपीएच, पीजीडीएमसीएच इगनू तथा सीएचसीडब्ल्यूएम इगनू के छात्रों को शिक्षण एवं प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रो मोहन ने बताया कि भारतवर्ष में इतना बड़ा विभाग अकेला यह ही है जिसके अंतर्गत ग्रामीण स्वास्थ्य एवं प्रशिक्षण केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दो प्रयोगात्मक शिक्षण स्वास्थ्य उपकेंद्र तथा अर्बन स्वास्थ्य केंद्र आता है। इस विभाग के प्रतिभावान विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक प्रदान किया जाता रहा है।
उन्होंने बताया कि विभाग को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा डब्ल्यूएचओ फेलो प्रशिक्षण दिया गया है। यह विभाग यूनीसेफ, सेव द चिल्ड्रेन, स्टेट हेल्थ इंस्टीट्यूट, नेशनल हेल्थ मिशन, सिफ्सा एवं कम्युनिटी एक्सपेरिमेंटल लैब के तकनीकी सलाहकार के रूप में भी काम करता है। पिछले वर्ष डब्ल्यूएचओ जिनेवा द्वारा इस विभाग के ११ रेजीडेंटों को वर्बल ऑटोप्सी से सम्मानित किया गया। यह विभाग राष्ट्रीय कार्यक्रमों को संचालित करता है और समय-समय पर तकनीकी सहयोग भी प्रदान करता है। इस समय भी विभाग में राष्ट्रीय कार्यक्रम के कई हेल्थ प्रोजेक्ट चल रहे हैं। प्रो मोहन ने बताया कि यहां के विद्यार्थियों को नुक्कड़ नाटक एवं क्षेत्रीय भ्रमण के द्वारा सम्बन्धित विषय की शिक्षा दी जाती है। इसके द्वारा विशेष क्लीनिक जैसे स्त्री रोग, दंत चिकित्सा, गुप्त रोग, अल्ट्रासाउंड एवं एक्स-रे एवं टीकाकरण क्लीनिक व मोबाइल स्वास्थ्य क्लीनिक चलाकर ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध करायी जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सेना की नर्सों का प्रशिक्षण भी इसी विभाग द्वारा किया जाता है। इस कार्यक्रम में केजीएमयू के अन्य चिकित्सक भी उपस्थित रहे।