-मानसिक प्रताड़ना भी पैदा करती है कैंसर, होम्योपैथिक में सटीक इलाज
-शोध में प्रमाणित : दवाओं से मानसिक दिक्कत के साथ ही कैंसर खत्म

धर्मेन्द्र सक्सेना
लखनऊ। आपने कई बार ऐसा सुना होगा कि फलां व्यक्ति को कैंसर हो गया है, जबकि न तो वह शराब पीता है, न तम्बाकू खाता है, न सिगरेट पीता है, कहने का अर्थ है कोई ऐसा शौक नहीं करता है जो कैंसर के लिए जिम्मेदार होते हैं। आधुनिक पैथी में ऐसे केस में कारणों में ज्ञात नहीं लिख कर इलाज किया जाता है। लेकिन वह जड़ से खत्म नहीं होता क्योंकि समस्या की जड़ नहीं खत्म होती। होने के कारणों में सामान्यत: तम्बाकू, अल्कोहल, कलर्स, पेंट्स, केमिकल जैसे कारणों पर गौर किया जाता है, लेकिन एक और कारण हैं कैंसर होने का वह है मानसिक स्थिति, जिस पर सामान्यत: किसी का ध्यान जाता ही नहीं है। ऐसे मरीजों जिनमें कैंसर के ज्ञात कारण नहीं थे उनकी मानसिक परेशानी का होम्योपैथिक इलाज किया गया तो परिणाम चमत्कार से कम नहीं थे, इन लोगों की न सिर्फ मानसिक परेशानियां दूर हुईं बल्कि कैंसर भी ठीक हो गया।
यह महत्वपूर्ण जानकारी गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के संस्थापक होम्योपैथिक विशेषज्ञ डॉ गिरीश गुप्त ने आरोग्य भारती के वेबिनार में दी। वेबिनार का विषय मल्टीडिसिप्लनेरी अप्रोच फॉर प्रीवेंशन एंड मैनेजमेंट ऑफ कैंसर था। इस वेबिनार में आधुनिक चिकित्सा, आयुर्वेद चिकित्सा से जुड़े विशेषज्ञों को भी आमंत्रित किया गया था। आधुनिक चिकित्सा के विशेषज्ञों में उत्तर प्रदेश यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज, सैफई के कुलपति डॉ राजकुमार, केजीएमयू के पूर्व कुलपति प्रो एम एल बी भट्ट जैसे दिग्गजों की उपस्थिति में कैंसर को लेकर किये गये अपने शोध और उपचार के बारे में डॉ गिरीश गुप्ता ने विस्तार से जानकारी दी, साथ ही कहा कि ठीक हुए मरीजों से भी इस विषय में चाहें तो कोई भी वार्ता कर सकता है।
मानसिक कारणों से कैसे बनता है कैंसर
डॉ गिरीश गुप्ता ने बताया कि मानसिक कारणों कैंसर बनने के पीछे व्यक्ति का लगातार प्रताड़ना सहना, सास-बहू के झगड़े में मानसिक प्रताड़ना, कार्यस्थल पर अधिकारी या मंत्री से अनबन होने पर प्रताड़ना झेलना, आर्थिक हानि से प्रताड़ना झेलना, जवान बेटे की मौत का गम, बच्चों द्वारा वृद्धाश्रम में डाल दिये जाने की प्रताड़ना आदि के दौरान मस्तिष्क में जो बदलाव होते हैं, वे हार्मोंस पर असर डालते हैं, वह इस दौरान कुछ केमिकल्स को बॉडी में रिलीज करता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता डिस्टर्ब होने से सेल मल्टीप्लाई होने लगते हैं जिससे किसी भी ऑर्गन कैंसर बन जाता है, हार्ट, स्किन डिजीज भी पैदा हो सकती हैं।
ब्रेस्ट कैंसर में हुआ फायदा
डॉ गुप्त ने कहा कि कई बार मेरे पास ब्रेस्ट कैंसर की मरीज आती हैं जिन्होंने न कभी तम्बाकू खायी होती है, न अल्कोहल लिया होता है, कहने का तात्पर्य यह है कि आम तौर पर जिन वजहों को कैंसर के लिए जिम्मेदार माना जाता है, उन वजहों में कोई भी वजह न पाये जाने पर मैं उसकी मानसिक स्थिति की ओर फोकस करके जब उस मानसिक स्थिति का इलाज किया तो उसका लाभ उसे ब्रेस्ट कैंसर में मिला।
लम्बी मानसिक प्रताड़ना से हो गया प्रोस्टेट कैंसर
डॉ गुप्ता ने बताया कि एक केस जो जर्नल में प्रकाशित होने के लिए गया हुआ है, उसके बारे में मैं बताता हूं, उन्होंने बताया कि तीन साल पहले 72 साल की उम्र में एक पुरुष मरीज (तकनीकी कारणों से नाम छिपाया गया है) यूरीन रुकने की शिकायत लेकर आये थे जिन्हें उन्होंने तत्काल यूरोलॉजिस्ट के पास जाने की सलाह दी, जहां उन्हें कैथेटर लगाया गया। कैथेटर में चिकित्सक ने ब्लड के क्लॉट्स देखे तो उनकी कैंसर के लिए प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (पीएसए) जांच करायी तो रिजल्ट पीएसए 40, प्रोस्टेट 40 ग्राम निकला। इसके बाद जब चिकित्सक ने उन्हें बायप्सी कराने की सलाह दी। लेकिन उन्होंने बायप्सी कराने से इनकार कर होम्योपैथिक उपचार के लिए अनुरोध किया। डॉ गिरीश गुप्त ने साफ तौर पर स्वीकार किया हालांकि मैं नहीं चाह रहा था कि उनका इलाज करूं लेकिन उनकी जिद थी कि वह इलाज होम्योपैथिक ही चाहते हैं।
डॉ गुप्त ने बताया कि इसके बाद उनकी केस हिस्ट्री बनायी गयी। हिस्ट्री में पाया गया कि उनकी पत्नी को लिवर सिरोसिस था, पांच साल से इलाज चल रहा था, किडनी फेल हो गयी और अंतत: उनकी मृत्यु हो गयी। मरीज ने बताया कि वह पेशे से इंजीनियर थे, सोचा था कि बुढ़ापे में पत्नी, बच्चों के साथ एन्ज्वॉय करूंगा, लेकिन रिटायर होते ही पत्नी बीमार पड़ गयीं, उनकी इतनी सेवा की, इलाज किया, 10-20 लाख खर्च करने के बाद भी उन्हें बचा नहीं सका। उन्हें लगने लगा कि उनकी जिन्दगी भी बेकार है, भगवान उन्हें भी उठा ले। डॉ गुप्त ने बताया कि उनकी सारी कहानी सुनने के बाद उन्होंने उनका प्रोस्टेट और कैंसर का उपचार न करके उन्हें हुए मेंटल, फिजिकल टॉर्चर, फाइनेंशियली टूट जाने के बाद भी सफलता हाथ न लगने से उन्हें मिली मानसिक प्रताड़ना के लक्षणों को ध्यान में रखकर दवा का चुनाव किया और इलाज शुरू किया।
डॉ गिरीश गुप्त ने बताया कि एक हफ्ते बाद मरीज ने सूचना दी कि दवा से पेशाब में खून आना बंद हो गया है, साथ ही उन्होंने कैथेटर हटाने की इच्छा जाहिर करने के साथ ही उसे हटवा दिया। इसके बाद यूरीन नॉर्मल आने लगा, 15 दिन बाद वह डॉ गुप्ता की क्लीनिक पर आये तो उनके अंदर बदलाव दिखा वह था कि वह मुस्करा रहे थे, और अपनी बीमारी के ठीक होने के प्रति बहुत आशान्वित दिख रहे थे।
डॉ गुप्ता ने बताया कि 15 दिन की दवा के बाद पीएसए और अल्ट्रासाउंड कराया तो पीएसए 40 से 26 आ गया, प्रोस्टेट भी घट गया, फिर दो माह बाद जांच करायी तो पीएसए 1.5 आया जो कि नॉन कैंसरस होता है प्रोस्टेट 16 ग्राम आ गया यह 20 ग्राम तक नॉर्मल होता है। डॉ गुप्ता बताते हैं कि तीन साल हो गये इस समय 75 वर्ष की आयु में वह ठीक हैं, कोई भी देख सकता है, इलाज भी बंद है, सब नॉर्मल है।
डांट, बेवजह निलंबन, अपमान से मिली मानसिक प्रताड़ना
एक और उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि एक अवकाश प्राप्त अधिकारी नर्वस सिस्टम और प्रोस्टेट कैंसर की शिकायत के साथ व्हील चेयर पर लाये गये, ये अफसर शाकाहारी थे, सिगरेट, तम्बाकू, प्याज, लहसुन यहां तक कि इलायची, लौंग तक नहीं खाते थे, 40 साल से रोजाना टहलते थे, योगा करते थे, लेकिन फिर भी कैंसर के शिकार हो गये।
डॉ गुप्त ने बताया कि इनका भी जब ज्ञात कारण नहीं मिला तो उनकी हिस्ट्री जानी गयी तो मरीज से पता चला कि उन्हें कुछ साल पूर्व कार्यस्थल पर भरी मीटिंग में सबके सामने बुरी तरह डांटा गया था, इससे उन्हें मेंटल शॉक लग गया, जबकि गलती उनकी नहीं थी। उन्हें सस्पेंड भी कर दिया गया, इसके बाद उन्होंने कहीं भी आना-जाना छोड़ दिया। हालांकि कुछ सालों बाद उनका निलंबन खत्म हो गया। इनका भी इलाज मानसिक प्रताड़ना की दवाओं से किया गया।
किसी पैथी को डाउनग्रेड न करें
डॉ गिरीश ने कहा कि अभी जैसा कि डॉ राजकुमार ने कहा कि हम बीमारी के कारणों तक नहीं पहुंचे, तो ऐसा इसलिए है इलाज में मस्तिष्क को अलग कर दिया, मनोविज्ञान को अलग कर दिया, शरीर को टुकड़ों-टुकड़ों में विभाजित कर दिया तो होलिस्टिक कहां रहा। उन्होंने कहा कि होम्योपैथिक के जनक डॉ सैमुअल हैनिमैन 1780 में एमडी कर जर्मनी के टॉप ऐलोपैथिक डॉक्टर होने के बाद भी अपने मरीजों के बार-बार उसी रोग को लेकर उनके पास आने के बाद होम्योपैथी का अविष्कार किया जिसमें होलिस्टिक एप्रोच के साथ इलाज किया, पर्सन एज ए होल यानी अंग भले ही अलग-अलग नाम से हैं लेकिन पूरा शरीर एक है, और इलाज में पूरे शरीर को साथ लेकर चलना होगा। इसे आधुनिक चिकित्सा वाले साइकोसोमेेटिक विधा भी कहते हैं। डॉ गुप्ता ने कहा कि ऐलोपैथिक डॉक्टरों के साथ होम्योपैथिक डॉक्टरों को भी इस बारे में सोचना चाहिये कि कैंसर में मानसिक स्थिति को कारण न मानना मिसिंग लिंक है।
डॉ गिरीश ने अपने सुझाव में कहा कि यह 21वीं सदी का भारत है, यहां ऐसे नहीं चलेगा। इलाज की दूसरी पद्धतियों को डाउनग्रेड करना छोड़ दीजिये, आज मिलकर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सबका लक्ष्य एक है मरीज को ठीक करना, चाहे वह ऐलोपैथी, होमियोपैथी, आयुर्वेद, यूनानी, नैचुरोपैथी, योगा कोई भी पद्धति हो। डॉ गुप्ता ने कहा कि अगर एलोपैथी में सभी बीमारियों का इलाज होता तो दूसरी पैथीज खत्म हो गयी होतींं, क्योंकि सरकारों ने ऐलोपैथी को ही अधिक सपोर्ट दिया है। दूसरी पैथीज आज भी अपने दम पर चल रही हैं।
