-एशियन देशों के वेबिनार में अध्यक्ष डॉ गिरीश गुप्ता ने रखे विचार
-इंटरनेशनल फोरम फॉर प्रमोटिंग होम्योपैथी ने आयोजित किया कार्यक्रम

सेहत टाइम्स ब्यूरो
लखनऊ। होम्योपैथी की ताकत से सरकारों, नीति निर्धारकों के साथ ही आमजन में विश्वास पैदा करने के लिए यह आवश्यक है कि होम्योपैथिक उपचारित रोगियों का रिकॉर्ड रखा जाये। इसके लिए न सिर्फ भारत बल्कि पूरे एशिया रीजन, जहां होम्योपैथिक चिकित्सक उपचार कर रहे हैं, में प्रयास किये जाने चाहिये, वर्तमान में होम्योपैथिक चिकित्सक अपने मरीजों को दवा तो देते हैं, उन्हें लाभ भी पहुंचता है लेकिन इसका रिकॉर्ड नहीं है। इसका नतीजा यह है कि सस्ती, प्रयोग में सुलभ, शिशु से लेकर बुजुर्गों तक लाभकारी, बिना किसी साइड इफेक्ट वाली इस पैथी की दवाओं की ग्राह्यता लोगों में नहीं हो पा रही है।


यह विचार एशिया का प्रतिनिधित्व करने वाली एशियन होम्योपैथिक मेडिकल लीग एंड होम्योपैथिक रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष व लखनऊ स्थित गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के संस्थापक होम्योपैथिक विशेषज्ञ डॉ गिरीश गुप्ता ने 11 नवम्बर को संयुक्त अरब अमीरात से आयोजित एक वर्चुअल वेबिनार में कही। भारतीय समयानुसार देर रात तक चले इस वेबिनार में भारत के विभिन्न भागों के साथ ही पूरे एशिया के देशों के होम्योपैथिक चिकित्सक, विद्यार्थी भी जुड़े। इस वेबिनार का आयोजन इंटरनेशनल फोरम फॉर प्रमोटिंग होम्योपैथी (आईएफपीएच) के तत्वावधान में डॉ जेएम बिलाल एवं उनकी टीम ने किया था।
डॉ गुप्ता ने अपने सम्बोधन में कहा कि होम्योपैथिक उपचार में रिकॉर्ड का महत्व बताते हुए कहा कि मैं होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में प्रैक्टिस तो 1982 से कर रहा हूं लेकिन रिकॉर्ड कीपिंग 1995 से शुरू की, उन्होंने बताया कि रिकॉर्ड रखने से मुझे शोध कार्य में आसानी हुई और मैं लोगों के सामने आंकड़ों के सबूत सहित केस प्रस्तुत कर सका।
ज्ञात हो डॉ गुप्ता ने स्त्री रोगों और त्वचा रोगों पर की गयीं अपनी शोध और ठीक किये मरीजों में से कुछ का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए दो पुस्तकें भी लिखी हैं, इनमें एक पुस्तक का प्रकाशन 2017 में तथा दूसरी का प्रकाशन 2020 में पिछले दिनों हुआ। स्त्री रोगों में वे रोग शामिल हैं जिनका आधुनिक चिकित्सा पद्धति में इलाज सिर्फ सर्जरी है, ऐसे रोगों को भी सिर्फ होम्योपैथिक दवाओं से ही ठीक किया गया। इस मौके पर डॉ गुप्ता ने स्त्री रोगों एवं त्वचा रोगों के कुछ केसों पर चर्चा करते हुए उन रोगों को ठीक करने को लेकर की गयी अपनी रिसर्च के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।
डॉ गुप्ता ने अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि मैंने जब होम्योपैथिक में पीएचडी की थी, उस समय पेपर लिखने के लिए मुझे कोई रेफरेंस बुक नहीं मिल रही थी, क्योंकि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं था। परन्तु आज ऐसा नहीं है, आज होम्योपैथिक में एमडी और रिसर्च करने वाले विद्यार्थियों के साथ-साथ जो चिकित्सक प्रैक्टिस कर रहे हैं, उनके लिए ये किताबें अत्यन्त उपयोगी हैं। उन्होंने कहा कि इन किताबों में उपचार किये हुए रोगियों के रोग की डायग्नोसिस करने के तरीके, रोग के लिए दवा के चयन के तरीके, किस दवा से लाभ हुआ, रोग के पहले और बाद की जांच रिपोर्ट जैसे सभी सूचनायें दी गयी हैं। पुस्तक में उन केसों का भी प्रकाशन किया गया है जिनके शोध पत्र विभिन्न होम्योपैथिक जर्नल में भी प्रकाशित हो चुके हैं।
उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति जब चाहे उनके द्वारा ठीक किये गये मरीजों के रिकॉर्ड देख सकता है, उन्होंने कहा कि बहुत से लोग आते भी हैं। उन्होंने इस मौके पर उन्होंने बताया कि सामान्यत: होम्योपैथिक चिकित्सक अनक्लासिकल तरीके से उपचार करते हैं, मैंने भी शुरुआत के 13 वर्षों तक अनक्लासिकल तरीके से उपचार किया लेकिन मुझे इससे अच्छे रिजल्ट नहीं मिले, सफलता का प्रतिशत भी कम था। इसके बाद मैंने क्लासिकल तरीके से इलाज शुरू किया तो न सिर्फ सफलता का प्रतिशत बढ़ गया बल्कि मैं विटिलिगो (ल्यूकोडर्मा) तथा सोरियासिस जैसी जटिल बीमारियों का भी सफल इलाज कर सका। इस वेबिनार का संचालन डॉ जोस आइजक ने किया। कार्यक्रम में अनेक चिकित्सकों और विद्यार्थियों ने डॉ गुप्ता से कई प्रकार के प्रश्न पूछे तथा मसलों पर चर्चा की।
