पैथोलॉजी के अवैध संचालन को वैध बनाने की कोशिश संवैधानिक अधिकारों का उल्‍लंघन

गुजरात सरकार के रिजोल्‍यूशन को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना और संविधान विरुद्ध बताया डॉ राजेन्‍द्र ललानी ने

 

डॉ राजेन्द्र ललानी

स्‍वास्‍थ्‍य और इलाज किसी भी व्‍यक्ति का मूल संवैधानिक अधिकार है। इसमें किसी भी आधार पर कोई भी बदलाव कोई भी सरकार नहीं कर सकती है। लेकिन इसके उलट गुजरात सरकार ने एक सरकुलर जारी कर इस अधिकार पर  चोट की है। सरकार ने एक सरकुलर जारी कर लैब रिपोर्ट बनाने और लैब रिपोर्ट पर डायग्‍नोसिस करने को अलग-अलग कर दिया है, और डायग्‍नोसिस करने की स्थिति में ही एमबीबीएस, एमडी की अनिवार्यता रखी है। कुल मिलाकर सरकार ने अवैध रूप से चल रहीं पैथोलॉजी को वैध बनाने का रास्‍ता साफ कर दिया है। यही नहीं इस सरकुलर से उच्‍चतम न्‍यायालय के दिसम्‍बर 2017 के आदेश की अवहेलना की है।

यह आरोप गुजरात की एसोसिएशन ऑफ पैथोलॉजिस्‍ट्स एंड माइक्रोबायोलॉजिस्‍ट्स के अध्‍यक्ष डॉ राजेन्‍द्र ललानी ने लगाते हुए बताया कि राज्‍य सरकार ने बीती 23 अगस्‍त, 2018 को एक सरकारी रिजॉल्‍यूशन जारी करते हुए पैथोलॉजी चलाने के लिए तीन कैटेगरी बनायी हैं इसमें पैथोलॉजी संचालन से लैब् रिपोर्ट तैयार करने और रिपोर्ट पर इन्‍टरपिटेशन, डायग्‍नोसिस रिपोर्ट तैयार करने को अलग-अलग बांट दिया है जबकि बिना डायग्‍नोसिस रिपोर्ट तैयार ही नहीं हो सकती है।

 

उन्‍होंने बताया कि नये सरकुलर के अनुसार पैथोलॉजी को तीन कैटेगरी में बांटा गया है बेसिक कम्‍पोसिट, मीडियम और एडवांस्‍ड। इसमें बेसिक कम्‍पोसिट लैब के लिए एमबीबीएस, एमडी पैथोलॉजी की अनिवार्यता नहीं रखी गयी है, इसमें अनिवार्यता सिर्फ उसी स्थिति में है जब लैब रिपोर्ट पर डायग्‍नोसिस तैयार की जानी हो उस स्थिति में एमबीबीएस का होना अनिवार्य किया गया है। शेष दोनों मीडियम और एडवांस्‍ड में एमडी की अनिवार्यता रखी गयी है। उन्‍होंने कहा कि जांच करने वाले की योग्‍यता को आधार मानते हुए कैटेगरी बनाना ही संविधान विरुद्ध है। क्‍योंकि जो बेसिक कम्‍पोसिट में जांच कराता है उसकी जान भी उतनी की कीमती है जितनी एडवांस्‍ड लैबोरेटरी में कराने वाले की।

 

डॉ ललानी ने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई भोजन का व्‍यवसाय करता है तो वह चाहें ढाबा चलाये, एक स्‍टार होटल चलाये या पांच सितारा होटल चलाये मूल रूप में किसी भी जगह भोजन की क्‍वालिटी से समझौता नहीं किया जा सकता है, बाकी सहूलियतों में फर्क हो सकता है लेकिन भोजन सभी जगह ऐसा होता है जो शरीर को हानि न पहुंचाये, यही बात पैथोलॉजी पर लागू होती है कोई अपनी पैथोलॉजी में कितनी भी सुविधा बढ़ा ले लेकिन जांच करने वाले की योग्‍यता हर पैथोलॉजी में एक ही होनी चाहिये।

 

उन्‍होंने बताया कि सरकुलर में बेसिक कम्‍पोसिट कैटेगरी के लिए यह नहीं लिखा है कि इसे टेक्‍नीशियन करेगा लेकिन यह भी नहीं लिखा है कि क्‍या योग्‍यता होनी चाहिये। सब भ्रम जैसी स्थिति रखी है। उन्‍होंने कहा कि लैब कैसी भी हो उसमें योग्‍यता अलग-अलग हो ही नहीं सकती है। चाहे ज्‍यादा पैसे ले रहा हो, चाहें कम पैसे लेता हो चाहे फ्री करता हो योग्‍यता तो हर लैब में एक ही होनी चाहिये।

 

डॉ ललानी ने कहा कि गुजरात में जो सरकुलर जारी किया है उसमें क्‍लीनिकल इस्‍टे‍ब्लिशमेंट एक्‍ट को आधार बनाया गया है जबकि गुजरात में क्‍लीनिकल इस्‍टेब्लिशमेंट एक्‍ट लागू ही नहीं है। उन्‍होंने बताया कि अगर सरकार एमसीआई की जगह नेशनल मेडिकल कमीशन बनाना चाहती है तो उसे भी संसद से पास कराना पड़ेगा और उसके बाद भी एमसीआई का मूलभूत कानून नहीं बदल सकती। उन्‍होंने बताया कि गुजरात हाईकोर्ट के 2010 के फैसले के बाद जो नियम एमसीआई ने तय किये थे, उसमें पैथोलॉजी चलाने और रिपोर्ट पर दस्‍तखत करने के अधिकारों को भी सरकार अपनी ओर से नहीं बदल सकती है। एमसीआई एक स्‍वायत्‍त संस्‍था है, योग्‍यता को बदलने का अधिकार भी एमसीआई के पास है। उन्‍होंने बताया कि अवैध पैथोलॉजी के संचालन के केस में भी उच्‍चतम न्‍यायालय ने गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के बाद एमसीआई द्वारा तय किये गये मानकों को ही सही मान कर निर्णय दिया था। सरकारों के तर्क नहीं माने थे।

 

उन्‍होंने कहा कि सरकार की अवैध पैथोलॉजी को चलते रहने देने की कोशिश को सफल नहीं होने दिया जायेगा क्‍योंकि यह मसला आम आदमी के स्‍वास्‍थ्‍य और जीवन से जुड़ा है। उन्‍होंने बताया कि गुजरात सरकार के इस सरकुलर को चुनौती देने की तैयारी की जा रही है।