लोकबंधु चिकित्‍सालय में पंचकर्म से हो रहा जटिल रोगों का इलाज

-अन्‍य चिकित्‍सालायों में भी पंचकर्म चिकित्‍सा प्रोजेक्‍ट को किया जायेगा लागू
डॉ (मेजर) डीएस नेगी

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। आयुर्वेद पद्धति में पंचकर्म चिकित्सा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, यह चिकित्सा आर्थराइटिस, स्पोंडिलाइटिस, साइटिका, न्यूरोलॉजी संबंधी रोग, मानसिक रोग, त्वचा संबंधी विकार विशेषकर सोरायसिस में काफी लाभदायक है। इसके अतिरिक्त थायराइड, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अनिद्रा जैसे अनियमित जीवनशैली से उत्पन्न विकारों में भी पंचकर्म चिकित्सा की विशेष उपयोगिता है। इस पंचकर्म चिकित्सा की सुविधा राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन उत्तर प्रदेश के तहत आशियाना लखनऊ स्थित लोकबंधु राजनारायण संयुक्त चिकित्सालय में दी जा रही है।

यह जानकारी देते हुए अस्पताल के निदेशक डॉ (मेजर) डीएस नेगी ने बताया की आयुर्वेद का मूल उद्देश्य स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण तथा रोगों के विकारों का प्रशमन करना है। पंचकर्म चिकित्सा आयुर्वेद की शोधन पद्धति के अंतर्गत की जाती है जो दोनों उद्देश्यों की पूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने बताया कि देश तथा विदेश में अनेक चिकित्सा केंद्रों पर पंचकर्म का सुचारू रूप से क्रियान्वयन हो रहा है तथा अनेक लोग इसके द्वारा लाभान्वित हो रहे हैं।

अस्पताल की मुख्‍य चिकित्‍सा अधीक्षक डॉ अमिता यादव ने बताया कि  पंचकर्म विशेषज्ञ डॉ आदिल रईस यहां बीते अक्टूबर 2018 से कार्यरत हैं  तथा उन्हीं के निर्देशन में प्रशिक्षित स्टाफ द्वारा यहां पंचकर्म चिकित्सा दी जा रही है। उन्होंने बताया रोगों के समूल नाश के लिए ही आयुर्वेद में शोधन की उपयोगिता पर अधिक जोर दिया गया है। डॉ नेगी ने बताया की आज के परिपेक्ष में यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हमारी वायु जल एवं आहार सभी अत्यंत प्रदूषित हो रहे हैं और रोजाना नयी-नयी व्याधियों का कारण बन रहे हैं। उन्होंने बताया पंचकर्म चिकित्सा के द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए तथा स्वस्थ व्यक्ति के शोधन के लिए वसंत ऋतु में वमन कर्म, शरद ऋतु में विरेचन कर्म तथा वर्षा ऋतु में बस्ति कर्म का प्रयोजन किया जाता है।

उन्होंने बताया पंचकर्म चिकित्सा के अंतर्गत मुख्‍य पांच शोधन चिकित्‍सा प्रक्रियायें हैं। इनमें वमन कर्म में दोषों को मुख मार्ग से बाहर निकालना, विरेचन कर्म में दोषों को गुदा मार्ग से बाहर निकालना, बस्ति कर्म में गुदा मार्ग द्वारा औषधि प्रवृत्‍त कराना, नस्य कर्म में नाक के मार्ग द्वारा औषधि देना तथा रक्तमोक्षण यानी दूषित रक्‍त को जोंक द्वारा सिरावेधन द्वारा या कपिंग द्वारा बाहर निकाला जाता है।

पंचकर्म विशेषज्ञ डॉ आदिल रईस ने बताया कि रोगानुसार कटि बस्ति, जानु बस्ति, ग्रीवा बस्ति, अभ्यंग, रूक्ष स्वेदन, नाड़ी स्वेदन, उद्वर्तन, पोट्टली स्वेदन, शिरोधारा, शिरोपिचु, अक्षितर्पण इत्‍यादि चिकित्‍सा क्रियायें की जाती हैं।

डॉ नेगी ने बताया राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के इस प्रोजेक्ट को लखनऊ के अन्‍य अस्पतालों तथा प्रदेश के अन्य जिलों में भी भविष्य में प्रारंभ करने की योजना है, जिससे कि एलोपैथी चिकित्सा के साथ-साथ रोगियों को आयुर्वेदिक विशेष रूप से पंचकर्म चिकित्सा द्वारा लाभान्वित किया जा सके।