-अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में डॉ गौरांग गुप्ता ने ‘शारीरिक रोगों की उत्पत्ति और होम्योपैथिक उपचार में मन की भूमिका’ पर दिया व्याख्यान

सेहत टाइम्स
लखनऊ। अनेक प्रकार के शारीरिक रोगों की जड़ व्यक्ति के मन में उठने वाले विचारों की मिट्टी में पनपती हैं। मनः स्थिति के चलते होने वाले शारीरिक रोगों का होम्योपैथिक में सफल इलाज है। कुछ ऐसे ही रोगों के बारे में लखनऊ के गौरांग क्लिनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च GCCHR के कंसल्टेंट डॉ गौरांग गुप्ता ने ‘शारीरिक रोगों की उत्पत्ति और होम्योपैथिक उपचार में मन की भूमिका’ (Role of mind in the Genesis and homeopathic treatment of physical diseases) विषय पर अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में जानकारी दी, इसका आयोजन इंटरनेशनल फोरम फॉर प्रमोटिंग होम्योपैथी आईएफपीएच द्वारा 15 फरवरी को किया गया।

डॉ गौरांग ने कहा कि जो भी बीमारियां हैं, इनका जब तक कारण नहीं ढूंढ़ा जाएगा, तब तक उनका जड़ से इलाज संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्रेन मास्टर अंग है, जो पूरे शरीर को कंट्रोल करता है, और ब्रेन मन के कण्ट्रोल में होता है। भ्रम, सपनों, डर, भावनाएं, हमारी दिनचर्या, हमारे जीवन, प्रोफेशनल लाइफ, पर्सनल लाइफ का प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है, जो दिमाग को प्रभावित करता है। डॉ गौरांग ने बताया कि वहां से न्यूरोलॉजिकल पाथवे से या फिर एंडॉक्रिनलॉजिकल यानी हार्मोनल पाथवे से शरीर के विभिन्न अंगों पर असर जाता है, जिससे शारीरिक बीमारियां पैदा हो जाती हैं।

वेबिनार में डॉ गौरांग ने इस विषय पर की गयी रिसर्च का पेपर , जो कि होम्योपैथिक हेरिटेज पत्रिका वॉल्यूम 42 नंबर 4 सितंबर 2016 में प्रकाशित हुआ है, के बारे में जानकारी दी। विस्तार से समझने के लिए उन्होंने तीन मॉडल केसेस भी प्रस्तुत किये।

डॉ गुप्ता ने पहले मॉडल केस में एक 33 वर्षीय महिला का केस प्रस्तुत करते हुए बताया कि महिला bilateral ovarian endometriotic cysts with adenomyosis रोग से पीड़ित थी, उसकी दोनों ओवरीज में सिस्ट थी साथ ही यूट्रस में हारमोंस संबंधी शिकायत थी। यह महिला बहुत ज्यादा चिंता करने वाली तथा छोटी-छोटी बातों में घबराने के स्वभाव वाली थी, बहुत सवाल पूछना, बार-बार एक ही चीज को दोहराना, बार-बार लोगों से सांत्वना की अपेक्षा करना, निराशाजनक विचार आना और उस पर कोई नियंत्रण न होना भी इसकी आदतों में शामिल था।

दूसरा मॉडल कैस उन्होंने एक 48 वर्षीय महिला, जिसे विटिलिगो (सफ़ेद दाग) की शिकायत थी, के बारे में प्रस्तुत किया इस महिला की गर्दन, कोहनी, एब्डोमेन और टांगों में सफेद दाग थे। स्वभावगत यह महिला सौम्य, शर्मीली, अत्यधिक देखभाल करने वाली, बच्चों की चिंता को लेकर उसका मूड बहुत जल्दी-जल्दी बदल जाता था।
तीसरा केस उन्होंने 30 वर्षीय पुरुष, जिसे सोरियासिस की शिकायत थी, का प्रस्तुत किया। इस युवक की अंदरूनी इच्छा थी कि वह सिविल सर्विसेज में जाए और वह उसे पा सकता है लेकिन माता-पिता की बीमारियों और दूसरी जिम्मेदारियां की वजह से वह ऐसा नहीं कर सका और उसको मजबूरन एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करना पड़ा काम के जबरदस्त दबाव के कारण वह तनाव में रहने लगा था जिससे वह चिड़चिड़ा हो गया था और उसके अंदर वहां के लोगों से बदला लेने की भावना पनपने लगी थी। वह माता-पिता की बीमारी को लेकर भी चिंतित रहता था।
चार्ट के माध्यम से जानकारी देते हुए डॉक्टर गौरांग ने बताया कि तीनों केसेस में बीमारी के उपचार के लिए किस प्रकार रोग की डायग्नोसिस की गई तथा उनकी मनःस्थिति के लक्षणों को ध्यान में रखते हुए दवाओं का चुनाव किया गया।
डॉ गौरांग ने चिकित्सकों के लिए उपयोगी जानकारी देते हुए दवा चुनने की प्रक्रिया के बारे में भी विस्तार से बताया।
