-शारीरिक और मानसिक बीमारी से ग्रस्त किसी भी उम्र के व्यक्ति के लिए प्रभावी है यह थैरेपी

सेहत टाइम्स
लखनऊ। ऑक्यूपेशनल थैरेपी (ओटी) उपचार की वह प्रक्रिया है जो बच्चे, जवान, बूढ़े किसी भी व्यक्ति के रोजमर्रा के कार्यों में आ रही दिक्कतों को दूर करने में सहायक होती है। शरीर और मस्तिष्क से जुड़ी ऐसी अनेक बीमारियां हैं जिनमें व्यक्ति अपने दैनिक कार्यों को करने में भी असमर्थ होते हैं, ऐसे ही लोगों को अपने उन कार्यों को करना सिखाने के लिए ही ओटी थैरेपी दी जाती है।
ऑक्यूपेशनल थैरेपी के बारे में यह जानकारी सेंटर फॉर मेंटल हेल्थ फेदर की संस्थापक क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सावनी गुप्ता ने सेहत टाइम्स को एक मुलाकात में दी। उन्होंने बताया कि उनके सेंटर पर आने वाले बच्चों और बड़ों में इस प्रकार की समस्याएं देखी गयी हैं, ऐसे में उनकी काउंसिलिंग के साथ ही उन्हें ऑक्यूपेशनल थैरेपी भी कराकर उनके दैनिक कार्यों को करने में आ रही बाधाओें को दूर किया जाता है। उन्होंने बताया कि बच्चों में जिन रोगों के चलते बाधित होने वाले कार्यों को करने के लिए ओटी से उपचार की विशेष भूमिका है, उनमें सेरेब्रल पाल्सी, डाउन सिंड्रोम, ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर, अटेन्शन डेफिशिट, हाईपरऐक्टिविटी डिस्ऑर्डर, डेवलेपमेंटल डिले, इनटेलेक्चुअल डिसेबिलिटीडिसेबिलिटी व मस्कुलर एट्रॉफी जैसे रोग शामिल हैं, जबकि वयस्कों में होने वाले इस प्रकार के रोगों में गुलियन बेरी सिंड्रोम Guillain-Barré syndrome, एम्पुटेशन (हाथ-पैर कटना), स्ट्रोक्स/पैरालिसिस, अर्थराइटिस, ब्रेन इंजरी (मस्तिष्क में चोट), बर्न विक्टिम (जलने के शिकार व्यक्ति), एरगोनॉमिक्स (गलत ढंग से बैठने के कारण कमर, पीठ, कंधे आदि में उत्पन्न दर्द) शामिल हैं, तथा बुजुर्गों में होने वाली इस प्रकार की बीमारियों में अल्जाइमर्स/डिमेंशियाडिमेंशिया, पार्किन्सन जैसे रोग शामिल हैं।
सावनी ने बताया कि इन बीमारियों में रोजाना के कार्य जैसे ब्रश करना, नहाना, भोजन करना इत्यादि अनेकों छोटे-छोटे कार्य होते हैं जिन्हें ऑक्यूपेशनल थैरेपिस्ट रोगग्रस्त व्यक्ति को करना सिखाते हैं। सावनी ने स्पष्ट किया कि इन सभी बीमारियों में ऑक्यूपेशनल थैरेपी के अतिरिक्त बिहैवियर थैरेपी, फीजियोथैरेपी, स्पीच थैरेपी की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि बिहैवियर थैरेपी में व्यक्ति को उस कार्य के बारे में बताते हुए उस कार्य की महत्ता समझानी होती है, जबकि उस कार्य को अपने शरीर से कैसे करें इसकी जानकारी ऑक्यूपेशनल थैरेपी में दी जाती है, एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए शरीर में आने वाली दिक्कतों को दूर करने के लिए फीजियोथैरेपी की भूमिका होती है तथा अपने किये हुए कार्य को, अपने विचारों को, अपनी बात को दूसरे तक किस प्रकार पहुंचायें इसकी जानकारी देने का तरीका स्पीच थैरेपी के माध्यम से सिखाया जाता है।

ऑक्यूपेशन थैरेपी का एक उदाहरण देते हुए सावनी गुप्ता ने बताया कि जैसे ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिस्ऑर्डर रोग से ग्रस्त जो बच्चा होता है उसे जब वस्तुओं का अहसास करना सिखाना होता है, तो ऐसे में उसके शरीर को इस लायक बनाने के लिए गेंद के अंदर हवा भर कर गेंद से उसके शरीर पर प्रेशर दिया जाता है, इसके अलावा बच्चे को विभिन्न प्रकार के मुलायम से लेकर सख्त कार्पेट पर चलाया जाता है। उसे चीजों को टच कराकर अहसास करना सिखाया जाता है। सावनी बताती हैं कि चूंकि यह सारी प्रक्रिया बच्चा आसानी से करे इसके लिए इन प्रक्रियाओं को इनडोर खेल जैसे माध्यम से सिखाया जाता है।
सावनी ने कहा कि आजकल कम्प्यूटर पर अधिक समय तक कार्य करने के कारण ज्यादतर लोग पीठ, कमर, कंधे आदि के दर्द के शिकार हो रहे हैं। ऐसे लोग दवा पर दवा खाते रहते हैं, दवा के असर रहने तक तो उन्हें राहत रहती है लेकिन उसके बाद फिर वही स्थिति हो जाती है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार का दर्द होने का मुख्य कारण गलत ढंग से बैठना होता है, ऐसे लोगों को कुछ दिन तक ऑक्यूपेशन थैरपी से ठीक ढंग से बैठना सिखाकर उन्हें इस परेशानी से निजात दिला दी जाती है। उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त बुजुर्गों में अक्सर पार्किन्सन, अल्जाइमर्स जैसे रोग होने के चलते रोजाना के कार्यों में आने वाली अड़चनों को दूर करते हुए उन्हें इस लायक बनाया जाता है कि दैनिक कार्यों में कोई बाधा न आये।
