केजीएमयू के रिह्यूमेटोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष की विदाई के उपलक्ष्य में तीन दिवसीय ‘सेलीब्रेटिंग रिह्यूमेटोलॉजी’ शुरू
साइंटिफिक कन्वेन्शन सेंटर में देश-विदेश से आये रिह्यूमेटोलॉजिस्ट्स का जमावड़ा

लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के रिह्यूमेटोलॉजी विभाग के तत्वावधान में तीन दिवसीय सेलीब्रेटिंग रिह्यूमेटोलॉजी कार्यक्रम आज से यहां अटल बिहारी साइंटिफिक कन्वेन्शन सेंटर में शुरू हुआ। इस कार्यक्रम में रिह्यूमेटोलॉजी के रोगों पर चर्चा के लिए देश-विदेश से विशेषज्ञों का जमावड़ा लगा है। विभाग द्वारा इस आयोजन की एक बड़ी वजह रोगों पर चर्चा के साथ ही विभागाध्यक्ष प्रो सिद्धार्थ दास को विदाई देना भी है। प्रो दास इसी माह 16 मई यानी अगले गुरुवार को सेवानिवृत्त हो रहे हैं।

कार्यक्रम के पहले दिन आज ल्यूपस (lupus) बीमारी के बारे में यूनिवर्सिटी ऑफ केलीफोर्निया, लॉस एंजलिस, अमेरिका के डॉ राम राज सिंह ने बताया कि ल्यूपस बीमारी एक प्रकार की ऑटो इम्यून डिजीज है, इसमें शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति ही शरीर के कुछ हिस्सों पर हमला कर देती है, इसलिए इस बीमारी को सिविल वार का नाम भी दिया गया है। यह बीमारी किशोरावस्था से लेकर करीब 45 साल तक की आयु वालों को त्वचा, जोड़ों और किडनी पर अटैक करती है तथा इस बीमारी के शिकार लोगों में 90 फीसदी महिलायें व 10 फीसदी पुरुष होते हैं।
छह हफ्ते से ज्यादा रहें लक्षण तो दिखायें रिह्यूमेटोलॉजिस्ट को
डॉ सिंह ने बताया कि इस बीमारी के लक्षणों में चेहरे की त्वचा में लाल रैशेज, जोड़ों में दर्द, मुंह में छाले, थकान रहना, यूरीन में प्रोटीन पाया जाना है इसकी डायग्नोसिस के लिए ब्लड टेस्ट होता है। उन्होंने बताया कि यदि किसी व्यक्ति के चेहरे पर रैशेज पड़ जायें, बुखार हो, ऑर्थराइटिस की शिकायत हो, थकान हो और ये सब 6 सप्ताह से ज्यादा बना रहे तो उसे किसी रिह्यूमेटोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिये। उन्होंने बताया कि हालांकि भारत में रिह्यूमेटोलॉजिस्ट की बहुत कमी है, कुल मिलाकर यहां करीब 1000 रिह्यूमेटोलॉजिस्ट हैं जबकि जरूरत इससे कई गुना ज्यादा है। उन्होंने बताया कि दरअसल भारत में इस बीमारी के प्रति जागरूकता का काफी अभाव है इसलिए इससे ग्रस्त लोगों की सही संख्या बता पाना बहुत मुश्किल है लेकिन अमेरिका की बात करें तो वहां प्रति एक लाख लोगों में 90 को यह बीमारी होती है, इसी अनुपात में अगर देखा जाये तो भारत में 10 लाख से ज्यादा लोगों को यह बीमारी है। उन्होंने कहा कि यह बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं होती है लेकिन नियंत्रित जरूर हो जाती है।

देश में बेहद कम संख्या में हैं रिह्यूमेटोलॉजिस्ट
विभागाध्यक्ष प्रो सिद्धार्थ दास ने बताया कि रिह्यूमेटोलॉजिस्ट की संख्या मरीजों की तुलना में बेहद कम होने से इस बीमारी से ग्रस्त लोगों की परेशानी कम नहीं हो पाती है, उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिये कि इस रिह्यूमेटोलॉजिस्ट की संख्या बढ़ाने की तरफ कदम उठाये। सरकारी अस्पतालों में इसके विशेषज्ञों की उपलब्धता होनी चाहिये। उन्होंने बताया कि साथ ही लोगों को रिह्यूमेटोलॉजी की बीमारियों के प्रति जागरूक करने की जरूरत है।
रिह्यूमेटिक ऑर्थराइटिस का शुरू में ही इलाज न किया तो होगी यह दिक्कत
इसके अलावा आज के वैज्ञानिक सत्र में ऑस्टियों ऑर्थराइटिस और रिह्यूमेटिक ऑर्थराइटिस के बारे में भी बहुत सी जानकारियां दी गयीं। ऑस्टियो ऑर्थराइटिस जहां ओल्ड एज की बीमारी है वहीं रिह्यूमेटिक ऑर्थराइटिस यंग एज में होती है। रिह्यूमेटिक ऑर्थराइटिस बीमारी के बारे में जितनी जल्दी पता हो जाये और इलाज शुरू कर दिया जाये तो इससे जोड़ों में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है। जोड़ों के नुकसान से तात्पर्य टेढ़ापन, डीफॉर्मेशन से बचना है। यह 200 में से एक भारतीयों में पायी जाती है। इस बीमारी की शिकार भी महिलायें ज्यादा होती हैं जैसे चार मरीजों में तीन महिलायें और एक पुरुष होता है। डॉ सिंह ने बताया कि महिलाओं में गर्भावस्था के दौरान ये बीमारियां दब जाती हैं जो कि बाद में दोगुने जोर से अटैक करती हैं।
क्लैश ऑफ टाइटंस में बड़ी बात आयी सामने
आज एक सत्र में क्लैश ऑफ टाइटंस यानी देश-विदेश के नामी रिह्यूमेटोलॉजिस्ट की टीमों के बीच रिह्यूमेटोलॉजी के विशेष केस के बारे में जोरदार चर्चा का आयोजन किया गया। इसमें चार टीमें डॉ एएन मालवीय की टीम, डॉ एएन चंद्रशेखरन की टीम, डॉ वीआर जोशी की टीम तथा डॉ सुकुमार मुखर्जी की टीम शामिल रही। इस चर्चा में बताया गया कि रिह्यूमेटोलॉजी का एक मरीज ऐसा भी आया जिसके लक्षण रिह्यूमेटोलॉजी के थे लेकिन बाद में पता चला कि उसे टीबी और लेप्रोसी है।

साइंटिफिक कन्वेन्शन सेंटर जहां पर इसका आयोजन हो रहा है वहां एक डायनासोर की आकृति भी रखी गयी है जो कि सभी को आकर्षित कर रही है।
