Wednesday , November 10 2021

सीख

जीवन जीने की कला सिखाती कहानी – 77 

डॉ भूपेन्‍द्र सिंह

प्रेरणादायक प्रसंग/कहानियों का इतिहास बहुत पुराना है, अच्‍छे विचारों को जेहन में गहरे से उतारने की कला के रूप में इन कहानियों की बड़ी भूमिका है। बचपन में दादा-दादी व अन्‍य बुजुर्ग बच्‍चों को कहानी-कहानी में ही जीवन जीने का ऐसा सलीका बता देते थे, जो बड़े होने पर भी आपको प्रेरणा देता रहता है। किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) के वृद्धावस्‍था मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ भूपेन्‍द्र सिंह के माध्‍यम से ‘सेहत टाइम्‍स’ अपने पाठकों तक मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में सहायक ऐसे प्रसंग/कहानियां पहुंचाने का प्रयास कर रहा है…

प्रस्‍तुत है 77वीं कहानी –  सीख

एक राजा था जिसका नाम रामधन था उनके जीवन में सभी सुख थे। राज्य का काम काज भी ऐशो आराम से चल रहे था।  राजा के नैतिक गुणों के कारण प्रजा भी बहुत प्रसन्न थी। जिस राज्य में प्रजा खुश रहती हैं वहाँ की आर्थिक व्यवस्था भी दुरुस्त होती हैं इस प्रकार हर क्षेत्र में राज्य का प्रवाह अच्छा था। 

इतने सुखों के बाद भी राजा दुखी था क्योंकि उसकी कोई संतान नहीं थी यह गम राजा को अंदर ही अंदर सताता रहता था।  प्रजा को भी इस बात का बहुत दुःख था। वर्षों के बाद राजा की यह मुराद पूरी हुई और उसे एक पुत्र की प्राप्ति हुई।  पूरे नगर में कई दिनों तक जश्न मना। नागरिकों को राज महल में दावत दी गई।  राजा की इस ख़ुशी में प्रजा भी झूम रही थी।

समय बीतता जा रहा था राज कुमार का नाम नंदनसिंह रखा गया।  पूजा पाठ एवम इन्तजार के बाद राजा को सन्तान प्राप्त हुई थी इसलिये उसे बड़े लाड़ प्यार से रखा जाता था लेकिन अति किसी बात की अच्छी नहीं होती अधिक लाड़ ने नंदन सिंह को बहुत बिगाड़ दिया था।  बचपन में तो नंदन की सभी बातें दिल को लुभाती थीं पर बड़े होते-होते यही बातें बत्तमीजी लगने लगती हैं।  नंदन बहुत ज्यादा जिद्दी हो गया था उसके मन में अहंकार आ गया था वो चाहता था कि प्रजा सदैव उसकी जय जयकार करे उसकी प्रशंसा करें।  उसकी बात ना सुनने पर वो कोलाहल मचा देता था।  बैचारे सैनिकों को तो वो पैर की जूती ही समझता था।  आये दिन उसका प्रकोप प्रजा पर उतरने लगा था। वो खुद को भगवान के समान पूजता देखना चाहता था। आयु तो बहुत कम थी लेकिन अहम् कई गुना बढ़ चुका था।

नन्दन के इस व्यवहार से सभी बहुत दुखी थे।  प्रजा आये दिन दरबार में नन्दन की शिकायत लेकर आती थी जिसके कारण राजा का सिर लज्जा से झुक जाता था, यह एक गंभीर विषय बन चुका था ।

एक दिन राजा ने सभी खास दरबारियों एवम मंत्रियों की सभा बुलवाई और उनसे अपने दिल की बात कही कि वे राज कुमार के इस व्यवहार से अत्यंत दुखी हैं,  राज कुमार इस राज्य का भविष्य हैं अगर उनका व्यवहार यही रहा तो राज्य की खुशहाली चंद दिनों में ही जाती रहेगी। दरबारियों ने राजा को सांत्वना देते हुए कहा कि आप हिम्मत रखें वरना प्रजा नि:सहाय हो जायेगी।  मंत्री ने सुझाव दिया कि राजकुमार को एक उचित मार्गदर्शन एवम सामान्य जीवन के अनुभव की जरूरत हैं। आप उन्हें गुरु राधागुप्त के आश्रम भेज दीजिये सुना है वहां से जानवर भी इंसान बनकर निकलता हैं।  यह बात राजा को पसंद आई और उसने नन्दन को गुरु जी के आश्रम भेजा।

अगले दिन राजा अपने पुत्र के साथ गुरु जी के आश्रम पहुँचे।  राजा ने गुरु राधा गुप्त के साथ अकेले में बात की और नन्दन के विषय में सारी बातें कहीं।  गुरु जी ने राजा को आश्वस्त किया कि वे जब अपने पुत्र से मिलेंगे तब उन्हें गर्व महसूस होगा।  गुरु जी के ऐसे शब्द सुनकर राजा को शांति महसूस हुई और वे सहर्ष अपने पुत्र को आश्रम में छोड़ कर राज महल लौट गये।

अगले दिन सुबह गुरु के खास चेले द्वारा नंदन को भिक्षा मांग कर खाने को कहा गया जिसे सुनकर नंदन ने साफ़ इनकार कर दिया।  चेले ने उसे कह दिया कि अगर पेट भरना हैं तो भिक्षा मांगनी होगी और भिक्षा का समय शाम तक ही हैं अन्यथा भूखा रहना पड़ेगा।  नंदन ने अपनी अकड़ में चेले की बात नहीं मानी और शाम होते-होते उसे भूख लगने लगी लेकिन उसे खाने को नहीं मिला।  दूसरे दिन उसने भिक्षा मांगना शुरू किया। शुरुआत में उसके बोल के कारण उसे कोई भिक्षा नहीं देता था, लेकिन गुरुकुल में सभी के साथ बैठने पर उसे आधा पेट भोजन मिल जाता था।  धीरे-धीरे उसे मीठे बोल का महत्व समझ आने लगा और करीब एक महीने बाद नंदन को भर पेट भोजन मिला जिसके बाद उसके व्यवहार में बहुत से परिवर्तन आये।

इसी तरह गुरुकुल के सभी नियमों ने राजकुमार में बहुत से परिवर्तन किये जिसे राधा गुप्त जी भी समझ रहे थे एक दिन राधा गुप्त जी ने नंदन को अपने साथ सुबह सवेरे सैर पर चलने कहा। दोनों सैर पर निकल गये रास्ते भर बहुत बातें कीं।  गुरु जी ने नंदन से कहा कि तुम बहुत बुद्धिमान हो और तुममें बहुत अधिक उर्जा हैं जिसका तुम्हें सही दिशा मे उपयोग करना आना चाहिये।  दोनों चलते-चलते एक सुंदर बाग़ में पहुँच गये,  जहाँ बहुत सुंदर-सुंदर फूल थे जिनसे बाग़ महक रहा था।  गुरु जी ने नंदन को बाग़ से पूजा के लिए गुलाब के फूल तोड़ने को कहा।  नंदन झट से सुंदर-सुंदर गुलाब तोड़ लाया और अपने गुरु के सामने रख दिये।  अब गुरु जी ने उसे नीम के पत्ते तोड़कर लाने को कहा।  नंदन वो भी ले आया।  अब गुरु जी ने उसे एक गुलाब सूंघने दिया और कहा बताओ कैसा लगता हैं, नंदन ने गुलाब सुंघा और गुलाब की बहुत तारीफ की।  फिर गुरु जी उसे नीम के पत्ते चखकर उसके बारे में कहने को कहा।  जैसे ही नंदन ने नीम के पत्ते खाये उसका मुंह कड़वा हो गया और उसने उसकी बहुत निंदा की,  और पीने का पानी ढूंढ़ने लगा।

नन्दन की यह दशा देख गुरु जी मुस्कुरा रहे थे। पानी पीने के बाद नंदन को राहत मिली फिर उसने गुरु जी से हँसने का कारण पूछा।  तब गुरु जी ने उससे कहा कि जब तुमने गुलाब का फुल सूंघा तो तुम्हें उसकी खुशबू बहुत अच्छी लगी और तुमने उसकी तारीफ की लेकिन जब तुमने नीम की पत्तियाँ खाईं तो तुम्हे वो कड़वी लगीं और तुमने उसे थूक दिया और उसकी निंदा भी की।  गुरु जी ने नन्दन को समझाया, जिस प्रकार तुम्हें जो अच्छा लगता हैं तुम उसकी तारीफ करते हो उसी प्रकार प्रजा भी, जिसमें गुण होते हैं उसकी प्रशंसा करती हैं, अगर तुम उनके साथ दुर्व्यवहार करोगे और उनसे प्रशंसा की उम्मीद करोगे तो वे यह कभी दिल से नही कर पायेंगे। इस प्रकार जहाँ गुण होते हैं वहां प्रशंसा होती हैं।

नंदन को सभी बातें विस्तार से समझ आ गयीं,  और वो अपने महल लौट गया।  नंदन में बहुत परिवर्तन आया और वो बाद में एक सफल राजा बना।

कहानी की शिक्षा

गुरु की सीख ने नंदन का जीवन ही बदल दिया वो एक क्रूर राज कुमार से एक न्याय प्रिय दयालु राजा बन गया। इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती हैं कि हममें गुण होंगे तो लोग हमें हमेशा पसंद करेंगे लेकिन अगर हम अवगुणी हैं तो हमें प्रशंसा कभी नहीं मिल सकती।

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