बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम- भाग-3

पेरेंट्स बच्चों को खाना खिलाने के लिए टीवी के सामने बैठा देते हैं या फिर फोन में कुछ न कुछ लगा कर दे देते हैं. ये बहुत ही गलत बात है। ऐसे में बच्चों का ध्यान बंट जाता है और वे भूख से ज्यादा खाना खा लेते हैं। कुछ शोधों से पता चला है कि प्रति दिन 2 घंटे से अधिक समय तक टीवी देखने से बच्चों में भी मोटापा हो सकता है। भोजन के विज्ञापन भी बच्चों को मोटापे से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण कड़ी है। ज्यादा समय ऑनलाइन रहने से शारीरिक गतिविधि में कमी, उच्च कैलोरी युक्त भोजन का सेवन, कम ऊर्जा वाले भोजन और नींद में कमी कमी आती है। नींद की कमी से घ्रेलिन और लेप्टिन के सामान्य प्रभाव में परिवर्तन होता है, जिससे भूख बढ़ती है और तृप्ति कम होती है। अतः हम ज्यादा खाते हैं, कम सोते हैं, देर तक जागते हैं, ये सब किसी ना किसी तरह से हमारा नुकसान ही करते हैं।
धीरे-धीरे गायब होती जाती है नींद
रात्रि में गजेट्स द्वारा उत्सर्जित नीली रोशनी मेलाटोनिन के स्राव को दबाती और बाधित करती है। मीडिया में दिखाई जाने वाली हिंसक या यौन सामग्री बच्चों में उत्तेजना, भय या तनाव पैदा कर सकती है, जिससे नींद आने में देरी हो सकती है। इतना ही नहीं दिन के समय हिंसक मीडिया एक्सपोजर भी नींद की समस्याओं, दुःस्वप्न और रात में देर से सोने से जुड़ा हुआ है। ये दोनों ही नींद की गुणवत्ता को ख़राब करते हैं। सोशल मीडिया का अधिक उपयोग और इंटरनेट सर्फिंग की वजह से धीरे-धीरे नींद गायब होती जाती है और पता भी नहीं चल पाता है। इतना ही नहीं स्लीपिंग टूल के रूप में मीडिया का उपयोग करने से ज्यादा थकान, बाद में सोने का समय, प्रति सप्ताह कम घंटे की नींद और नींद की गुणवत्ता ख़राब हो जाती है।
सेल फोन या लैपटॉप का उपयोग करने वाले अधिकांश बच्चों की मुद्रा (पोस्चर) खराब हो जाती है, उनका सिर आगे की ओर झुक जाता है और कंधे स्क्रीन पर देखने के लिए आगे झुक जाते हैं। इससे सर्वाइकल स्पाइन की समस्या हो सकती है। अमेरिकन ऑप्टोमेट्रिक एसोसिएशन के अनुसार, जो कंप्यूटर पर ज्यादा काम करते हैं उन्हें ‘कंप्यूटर विजन सिंड्रोम’ की समस्या हो सकती है इसमें आंख और दृष्टि दोनों की समस्यायें शामिल हैं।
