महामारी वैश्विक है तो बचने की तैयारी भी वैश्विक स्‍तर पर करनी होगी : सेहत सुझाव-7

-कोविड-19 ने हमें सबक दिया है कि संक्रामक रोग आज भी बड़ी चुनौती

कोरोना संक्रमण काल से गुजरने के दौरान इससे सबक लेते हुए हमें आगे के जीवन में क्‍या-क्‍या सावधानियां बरतनी होंगी, अपनी जीवन शैली में क्‍या सुधार लाना होगा, इसे लेकर ‘सेहत टाइम्‍स‘ ने सेहत सुझाव देने की अपील करते हुए अपने प्रिय पाठकों से सुझाव मांगे थे। हमें खुशी है इस पर हमें सम्‍मानित पाठकों और विशेषज्ञों के विचार और सुझाव मिल रहे हैं, इसके लिए ‘सेहत टाइम्‍स‘ धन्‍यवाद अदा करता है।

डॉ अनुरुद्ध वर्मा

कोविड-19 के विश्वव्यापी संक्रमण ने इस मिथक को तोड़ दिया है कि संक्रामक रोगों के ख़िलाफ़ लड़ाई लगभग जीत ली गई है इसका प्रमाण है कि कोरोना वायरस के संक्रमण ने  दुनिया के 55 लाख लोगों को अपनी गिरफ्त में लिया और इसके कारण लगभग 3 लाख 50 हजार से अधिक लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। भारत में संक्रमित होने वालों का आंकड़ा 1 लाख 38 हजार से ऊपर निकल गया है तथा चार हजार से अधिक लोग मौत का शिकार हो गए हैं और देश एवम दुनिया में संक्रमण की रफ्तार अभी रुकी नहीं है तथा मौतों का सिलसिला जारी है।

कोविड-19 ने जहां गरीब देशों मेँ कहर बरपाया है वंही पर विकसित देशों की चिकित्सा व्यवस्था को चुनौती देते हुए लोगों को संक्रमित किया है। दुनिया मे कुछ संक्रामक रोगों से बचाव के टीके तो उपलब्ध है और कुछ के खोजने की प्रक्रिया जारी है । चेचक सहित अन्य छह संक्रामक बीमारियां लगभग समाप्त हो गई हैं परंतु दुर्भाग्य की बात है कि सारी सुरक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करते हुऐ अनेक खतरनाक रोग दोबारा फैलने लगे।

कुछ समय पूर्व प्लेग, पीला बुखार, कॉलरा, मेनिंगोकोकल मैनिंजाइटिस आदि संक्रामक रोग जिन्हें लगभग समाप्त हुआ मान लिया गया था पुनः जन स्वास्थ्य के खतरे के रूप में प्रकट होने लगे हैं इसी के साथ ही पूर्व में अज्ञात संक्रामक रोगों में भी अप्रत्याशित गति से वृद्धि हुई है। विगत कई वर्षों से दुनिया में कई संक्रामक बीमारियों का पता लगाया गया है उनमें  इबोला, हेमोरेजिक बुखार, एच आई वी, हेपेटाइटिस सी,सार्स, मर्स, स्वाइन फ्लू, डेंगू, चिकुनगुनिया ,बर्ड फ्लू आदि ने दुनिया में काफी कहर मचाया है और हजारों लोगों को प्रभावित कर उनकी मृत्यु का कारण बने हैं। इनमें से कई बीमारियों के लिए तो कोई निश्चित उपचार एवं टीका भी उपलब्ध नहीं है।

इधर एंटीबायोटिक दवाइयों के प्रति प्रतिरोधात्मक क्षमता का विकास भी मानव स्वास्थ्य के लिए जटिल समस्या बना हुआ है। कुछ दवाईयाँ जो संक्रामक रोगों पर कारगर थीं अब वह भी अपना असर कम कर रही हैं या नहीं कर रही हैं। संक्रामक रोगों के कम प्रभावी उपचार, ज्यादा लोगों को हॉस्पिटल में भर्ती होने की आवश्यकता, लंबी बीमारी के उपचार का ज्यादा खर्चा के कारण कार्यालयों एवं विद्यालयों में अनुपस्थिति बहुत बढ़ गई है।

आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?  रोग क्यों बढ़ रहे है ? यदि हम इस विचार करें तो पता चलता है कि रोगों के फैलाव में अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्राओं की बाढ़, महानगरों की बृद्धि, अस्वच्छ जल, सफाई की कमी, प्रयोगशालाओं में कृत्रिम वायरस के निर्माण की संभावना आदि प्रमुख हैं इसके अतिरिक्त  व्यापार का भूमंडलीकरण, भोजन के उत्पादन, निर्माण एवं रखरखाव में बदलाव, पर्यावरणीय कारण आदि भी मनुष्य पर संक्रामक रोगों के हमले के लिए जिम्मेदार हैं। तमाम देशों ने जनस्वास्थ्य में खर्च अन्य खर्चो से काफी कम कर दिये हैं जिससे नये उदभव हो रहे  रोगों के रोकथाम एवँ उपचार की खोज तेज गति से नहीं हो पा रही है या इसमें बहुत विलंब हो रहा है।

यदि महामारियों की पहचान समय से हो जाए तो महामारी की रोकथाम एवं जन हानि को काफी कम किया जा सकता है। इस समय हमारे सामने अनेक संक्रामक रोगों से निपटने की गम्भीर चुनौतियों हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि इनका समय से पता न चल पाना। इससे उस से निपटने के लिए कार्यवाही भी देर से शुरू हो पाती है इसके साथ ही प्रभावी एवम योग्य राष्ट्रीय सर्विलांस की व्यवस्था का अभाव, समय-समय पर स्वास्थ्य सूचना लोगों तक न पंहुच पाना जिससे घटनाओं पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया नहीं हो पाती है और सबसे बड़ी बात यह कि अंतरराष्ट्रीय तंत्र का मजबूत न होना। इन सारी चुनौतियों से निपटने के लिए समन्वित प्रयास जरूरी हैं। एक प्रभावी तंत्र विकसित करने की जरूरत है तभी समस्या का समाधान खोजा जा सकेगा।

आवागमन के पर्याप्त साधन होने एवम अंतराष्ट्रीय व्यापार के कारण संक्रामक रोगों का फैलाव तेजी से हो रहा है इसका ताजा उदाहरण है कोविड-19 का पूरी दुनिया मे फैलाव।  इसलिए सारे देशों को मिलकर भूमंडलीय स्तर पर संक्रामक रोगों के रोकथाम एवं उपचार के लिए प्रयास करना होगा एक संगठित एवम प्रभावी नीति बनानी होगी तभी संक्रामक रोगों को रोका जा सकेगा।

इसी के साथ संक्रामक रोगों से रोकथाम एवं उनके उपचार के लिए वैकल्पित चिकित्सा पद्धतियों जैसे होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी, सिद्धा, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतिओं को भी शामिल किया जाना चाहिए क्योंकि संक्रामक बीमारियों की रोकथाम एवम उपचार में इनकी उपयोगिता एवम कार्यकरिता असीमित संभावनायें निहित हैं जरूरत है उनको उजगार कर प्रयोग करने की निश्चित रूप से संक्रामक रोगों नियंत्रण में इनकी इस अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका साबित हो सकती है ।

डॉ अनुरुद्ध वर्मा, वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक