15 फीसदी बच्‍चों में अस्‍थमा होना, सबके लिए चिंता के साथ चिंतन का विषय

घर के अंदर छिपे अनेक कारणों से भी बच्‍चों पर तेजी से अटैक कर रहा दमा

लखनऊ। किसी भी देश का भविष्‍य उस देश के बच्‍चों में देखा जाता है कयोंकि भविष्‍य में बच्‍चे ही जब बड़े होंगे तो देश चलायेंगे। लेकिन भारत के लिए चिंता की बात यह है कि विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन डब्‍ल्‍यूएचओ की रिपोर्ट बताती है कि 5 वर्ष से 11 वर्ष की आयु वाले 15 फीसदी बच्‍चे अस्‍थमा की गिरफ्त में आ रहे हैं, जबकि भारत में देश की जनसंख्‍या के 2 प्रतिशत लोग अस्‍थमा के शिकार है। यानी बच्‍चों में अस्‍थमा का तेजी से बढ़ना अत्‍यंत चिंतित करने वाला है, क्‍योंकि जिस तेजी से यह सिलसिला बढ़ रहा है उससे इन बच्‍चों के साथ ही आने वाली पीढ़ियों पर दमा का बड़ा खतरा पैदा हो जायेगा क्‍योंकि अध्‍ययन में ऐसा पाया गया है कि उन लोगों को अस्‍थमा का खतरा बढ़ जाता है जिनके माता-पिता को यह बीमारी है। इसलिए इस दिशा में गंभीरता से कार्य करने की जरूरत है।

 

यह बात विश्‍व अस्‍थमा दिवस पर केजीएमयू के पल्‍मोनरी एंड क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग के विभागाध्‍यक्ष डॉ वेद प्रकाश और केजीएमयू स्थित पल्‍मोनरी विभाग के पूर्व विभागाध्‍यक्ष व पटेल चेस्‍ट इंस्‍टीट्यूट के पूर्व निदेशक डॉ राजेन्‍द्र प्रसाद ने संयुक्‍त रूप से कही। विशिष्‍ट अतिथि के रूप में आमंत्रित डॉ राजेन्‍द्र प्रसाद ने कहा कि अस्थमा या दमा फेफड़ों की एलर्जी से होने वाली बीमारी है। प्रदूषण की वजह से विश्व भर में दमा के मरीजों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। डब्‍ल्‍यूएचओ के अनुसार दुनिया भर में 235 मिलियन लोग दमा से प्रभावित है। विश्व के 10 प्रतिशत (लगभग 15-20 मिलियन) और भारत की कुल आबादी का लगभग 2 प्रतिशत आबादी दमे से पीड़ित है।

प्रमुख लक्षण

उन्‍होंने बताया कि इसके प्रमुख लक्षणों में 1.रोगी की श्वास फूलना, 2. खांसी आना 3.मरीज के सीने में कसाव व दर्द महसूस होना 4.बच्चो में अस्थमा का महत्वपूर्ण लक्षण सुबह या रात में खांसी/श्वांस फूलना/पसली चलना है। उन्‍होंने बताया कि इलाज के बाद भी यदि खांसी/श्वांस फूलना लगातार बना रहे तो यह भी अस्थमा का लक्षण हो सकता है।

 

अस्‍थमा के कारणों के बारे में बताते हुए डॉ वेद प्रकाश ने कहा कि अस्थमा की बीमारी मे फेफड़ो की श्वांस की नलियों मे सूजन आ जाती है। सूजन के कारण श्वास की नलियां सिकुड जाती हैं। अस्थमा के रोगियो के फेफड़े अतिसंवेदनशील होते हैं।

 

अस्थमा के अटैक के लिए जिम्मेदार कारकों में परागकण, फंफूदी, धूल कण, ठंड/ठंडी हवा, तिलचटटे, घर में साफ सफाई के समय उड़ने वाले कण, घरों मे बिछाये जाने वालो गद्दों, सोफा, कार्पेट मे पाये जाने वाले कीटाणु, पालतू जानवरों के स्पर्श (जानवरों के फर),   सिगरेट का धुंआ, बचपन में बार-बार होने वाले श्वांस के संक्रमण, विभिन्न खाद्य पदार्थ, हवा का प्रदूषण, रासायनिक तत्वों/दवाईयों से सम्पर्क, भावनात्मक तनाव शामिल हैं। उन्‍होंने बताया कि कभी-कभी कुछ मरीजों में अत्याधिक व्यायाम अस्थमा के अटैक के कारण हो सकते हैं।

 

अतिसंवेदनशील फेफड़े उपरोक्त कारको के सम्र्पक में आने से अस्थमा का अटैक होता है। उपरोक्त में से कोई भी कारण एलर्जी का कारण बन सकता है और यही एलर्जी दमा का कारण बनती है।  कम वजन के पैदा होने वालो बच्चो, ऑपरेशन से होने वाले बच्चो में अस्थामा होने का खतरा कई गुना होता है। बढ़ते हुए शहरीकरण एंव औधोगिकीकरण से अस्थमा रोगो की संख्या बड़ रही है

 

अस्थमा की पहचान – 1.     अस्थमा की पहचान मरीज द्वारा बतायें गये लक्षणों के आधार पर। 2. चिकित्सक द्वारा छाती के परीक्षण द्वारा। 3.  अस्थमा का सही पता लगाने के लिए कम्प्यूटराइज्ड पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट अत्यंत उपयोगी है, 4. एलर्जी टेस्ट (स्किन प्रिक टेस्‍ट, सीरियोलॉजिकल टेस्‍ट) के द्वारा विभिन्न प्रकार के एलर्जेंस जो कि दमा के कारक है को पहचानने में मदद मिलती है।

अस्थमा से बचाव एवं उपचार 

एलर्जन के सम्पर्क मे ना आने के लिये यथा सम्भव प्रयास किया जाना चाहिये। अस्थमा को पूरी तरह से ठीक नही किया जा सकता है। अस्थमा को पूर्ण रूप से नियंत्रित करके सक्रिय एंव सामान्य जिंदगी जी सकते है। अनुसंधानों से यह तथ्य सिद्व हो चुका है कि सूजन कम करने वाली दवाये एंव श्वांस नलियो से फैलाने वाली दवाओं से अस्थमा पर नियंत्रण एंव अस्थता अटैक को रोका जा सकता है। (ऐंटी इन्‍फ्लामेट्री) दवांये श्वांस की नली की सिकुड़न खत्म करने वाली दवाओं (रेस्‍क्‍यू मेडिसिन) की तुलना मे अधिक कारगर है और इन्हे लम्बे समय तक इंहेलेशनल थिरेपी के रूप में लिया जा सकता है। आज के समय में इंहेलेशनल थिरेपी सबसे सुरक्षित एवं बेहतरीन तकनीकि है। इसमें दवाइयां सीधे फेफड़ों मे पहुंचती है और तुरंत असर करती है। इनहेलर के जरिये दवा लेने से शरीर  के अन्य अंगों पर औषधियों के दुषप्रभाव से बचा जा सकता है।

 

उन्‍होंने बताया कि इनहेलर के प्रयोग के पश्चात् रोगी को अपने मुंह को पानी से अच्छी तरह से साफ करना चाहियें। जिससे मुंह मे रह गयी दवा रोगी को नुकसान ना पहुचा सके। नेबुलाइजर मशीन का प्रयोग केवल छोटे बच्चों अथवा गम्भीर रोगियों मे किया जाना चाहिये क्योकि नेबुलाइजर के नियमित प्रयोग से उसकी ट्यूब को साफ ना किया जाये तो इस स्थिति में संक्रमण का खतरा बना रहता है। विषेशज्ञो द्वारा प्रारम्भ की गयी दवाइयो को अपने आप कम ना करे तथा निर्देशो का पूर्ण रुप से पालन करे।