Wednesday , April 29 2026

एसजीपीजीआई ने दुर्लभ आनुवंशिक रोग में स्टेम सेल प्रत्यारोपण कर रचा इतिहास

-पहली बार हुआ ऑटोइम्यून  लिम्फोप्रोलिफेरेटिव सिंड्रोम से पीड़ित बच्चे में हेप्लॉयडेंशियल हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण

डॉ. कौशिक मंडल व डॉ. सायन सिन्हा रॉय

सेहत टाइम्स

लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई, लखनऊ ने प्रत्यारोपण के क्षेत्र में एक और इतिहास रचते हुए पहली बार दुर्लभ बीमारी ऑटोइम्यून लिम्फोप्रोलिफेरेटिव सिंड्रोम (एएलपीएस) से पीडि़त चार वर्षीय बच्चे में हेप्लॉयडेंशियल हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण Haploidentical Hematopoietic Cell Transplant करने में सफलता हासिल की है।

संस्थान द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार चार वर्ष की उम्र में बबलू (नाम परिवर्तित) को बार-बार मुंह में दर्दनाक छाले और गंभीर खुजलीदार लाल त्वचा के घाव होने लगे और धीरे-धीरे उसका लिवर व तिल्ली बढ़ गये और उसके पूरे शरीर में लिम्फनोड्स हो गए। उसे एनीमिया था, जिसे नियंत्रित करने के लिए स्टेरॉयड की आवश्यकता थी। आठ साल की उम्र में कई परीक्षणों और बार-बार अस्पताल में भर्ती होने के बाद बच्चे को लखनऊ स्थित एसजीपीजीआई रेफर किया गया। वहां बबलू को “ऑटोइम्यून लिम्फोप्रोलिफेरेटिव सिंड्रोम” नामक एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार होने का पता चला।

एएलपीएस (ALPS) बीमारी, “FAS” नाम के जीन में म्यूटेशन के कारण होती है। इस विकार में, शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वयं से ही लड़ने लगती है, (auto immune disorder) जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न प्रकार रक्त कोशिकाओं में कमी आ जाती है, जैसे लाल रक्त कोशिकाओं में कमी आ जाती है, जिससे एनीमिया होता है, न्यूट्रोफिल में कमी, जिससे संक्रमण होता है और प्लेटलेट्स की कमी, जिससे रक्तस्राव होता है। मरीज़ों को त्वचा पर गंभीर चकत्ते, मुंह में छाले और विभिन्न अंगों में सूजन हो जाती है। समय के साथ, उनमें से अधिकांश को लिम्फोमा जैसे कैंसर हो जाते हैं और गंभीर मामलों में उनकी मृत्यु भी हो जाती है।

उपचार में स्टेरॉयड का प्रयोग जारी रहता है, जिसके कई दुष्प्रभाव हैं। कुछ केंद्रों में अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (बोन- मैरो ट्रांस्प्लांट) (हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट – एचएससीटी) को स्थायी इलाज के रूप में आजमाया गया है, हालांकि, इस प्रक्रिया में जीवन का जोखिम बहुत अधिक होता है और इसके लिए बड़े पैमाने पर व्यवस्था और भारी मात्रा में पूँजी की आवश्यकता होती है।

डॉ. आर. के. धीमन के कार्यकाल में एसजीपीजीआई को “दुर्लभ रोगों के लिए उत्कृष्टता केंद्र” के रूप में नामित किया गया है और मेडिकल जेनेटिक्स विभाग को नोडल विभाग बनाया गया है। विभिन्न दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के उपचार के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा वित्तीय सुविधा एनपीआरडी पर (दुर्लभ रोगों की राष्ट्रीय नीति) के माध्यम से प्रदान की जाती है। हमेशा उन विकारों के उपचार पर जोर दिया जाता है, जिनका प्रत्यारोपण के माध्यम से एक बार में उपचार संभव हो।

डॉ. कौशिक मंडल के नेतृत्व में मेडिकल जेनेटिक्स विभाग द्वारा “चैरिटेबल सहायता कार्यक्रमों” और “एनपीआरडी निधि” सहित विभिन्न संसाधनों के माध्यम से कई आनुवंशिक विकारों का उपचार और प्रबंधन किया जा रहा है। सरकार की ऐसी निधियों के उपयोग के लिए कई नियम और विनियम हैं। इस रोगी की बीमारी सरकारी निधियों के उपयोग की आवश्यकताओं के अनुरूप थी। डॉ. कौशिक मंडल की अध्यक्षता वाली “दुर्लभ रोग मूल्यांकन समिति” द्वारा त्वरित मूल्यांकन और अनुमोदन के बाद, “हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल प्रत्यारोपण (एचएससीटी)” का निर्णय लिया गया।

हेमेटोलॉजी विभाग के डॉ. सायन सिन्हा रॉय प्रत्यारोपण टीम के प्रमुख सदस्य हैं, जिन्होंने प्रत्यारोपण के दौरान बेहद कम लागत वाली प्रभावी प्रक्रिया का उपयोग किया। इस प्रक्रिया में पिता ही डोनर थे, इसलिए एचएलए का आधा मिलान हुआ (जिसे हैप्लोआइडेंटिकल कहा जाता है), और यह प्रक्रिया बहुत ही जोखिम भरी थी।

डॉ. राजेश कश्यप के नेतृत्व में ऊर्जावान व अथक परिश्रम करने वाली टीम में डॉ. सायन सिन्हा रॉय, डॉ. चंद्रचूड़ पोटदार, डॉ. मनोज कुमार सिंह और डॉ. खलीकुर रहमान शामिल थे। संस्थान के निदेशक डॉ. आर. के. धीमन ने पूरी टीम को बधाई दी है। उत्तर प्रदेश और संभवतः पूरे देश में इस प्रकार के आनुवंशिक विकार के लिए यह पहला हैप्लोआइडेंटिकल, कम लागत वाला प्रत्यारोपण था। ‘यूरोपियन सोसाइटी फॉर ब्लड एंड मैरो ट्रांसप्लांटेशन’ ने आगामी सम्मेलन में इस शोध को सर्वश्रेष्ठ मौखिक प्रस्तुति के रूप में चुना है और इसे डॉ. सायन सिन्हा रॉय द्वारा प्रस्तुत किया जाएगा।