क्‍या करें और क्‍या न करें जिससे बच्‍चों को मोटापा न हो

-विश्‍व मोटापा दिवस पर बाल रोग विशेषज्ञ की महत्‍वपूर्ण सलाह

-गर्भावस्‍था से ही रहना होगा सजग, स्‍कूलों की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका

डॉ टीआर यादव

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। ओवर वेट होना इन दिनों वयस्कों और बच्चों दोनों में बहुत आम बात हो गई है। यह एक ऐसी बीमारी है जो कि बढ़ सकती है, लगातार बनी रह सकती है या ठीक भी हो सकती है। मोटापा रोग से  संबंधित अन्य गंभीर बीमारियों की होने की संभावना बढ़ जाती है।

बच्चों में मोटापा एक बीमारी है जो कि आगे चलकर वयस्कों में अनेक गंभीर स्वास्थ्य समस्या पैदा करती है और उनमें मृत्यु दर को काफी बढ़ा देती है। विश्‍व मोटापा दिवस (4 मार्च) के अवसर पर लखनऊ एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्‍स के सचिव डॉ टीआर यादव ने मोटापे से बच्‍चों को दूर रखने के लिए कुछ सुझाव दिये हैं।

डॉ यादव का कहना है कि भारत में ओवरवेट और मोटापे की समस्या विश्व औसत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है। पिछले चार दशकों में, हमारे देश और विश्व में खाद्य वातावरण में बहुत ही नाटकीय परिवर्तन हुआ है।

सामाजिक वातावरण में हुए बदलाव जैसे कि एकल परिवार का प्रचलन, माता-पिता दोनों का नौकरी करना, कम परिवारों द्वारा नियमित रूप से घर पर भोजन तैयार करना और खाद्य वस्तुओं पर विज्ञापनों का प्रभाव, कुछ ऐसे कारक हैं जिन्होंने खाद्य उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और इन उद्योगों की वजह से उच्च कैलोरीयुक्त खाद्य सामग्री की बाजार में भरमार हो गयी। प्रचुर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट युक्त पेय पदार्थ जैसे कि एनर्जी ड्रिंक, फ्रूट पंच और जूस आदि ने मोटापे को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।  

डॉ यादव कहते हैं कि फास्ट फूड/जंक फूड भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक खतरा बन गया है और आंकड़े इसके उपभोग में खतरनाक वृद्धि की ओर इशारा करते है। एक विशिष्ट फास्ट फूड भोजन में 2000 किलो कैलोरी और लगभग 84 ग्राम वसा की प्राप्ति होती है। जो बच्चे उच्च कार्बोहाइड्रेट युक्त पेय पदार्थों का सेवन करते हैं, वे कम भोजन का सेवन नहीं करते क्योंकि फास्ट फूड का तृप्ति मूल्य (satiety value) बहुत कम होता है।  संक्षेप में आज खाद्य वातावरण सस्ती कैलोरी की उपलब्धता में बदल गया है।

उन्‍होंने बताया कि हाल के वर्षों में ऑटोमोबाइल पर अधिक निर्भरता बढ़ गई है । बच्चे और वयस्क पैदल चलना और साइकिल से चलना पसंद नहीं करते हैं। बच्चों में शारीरिक गतिविधि की कमी और बाहर के खेलों में कमी, शैक्षणिक दबाव, शहरों में बच्चों को खेलने के लिए सुरक्षित खुले मैदानों की कमी, टेलीविजन, कंप्यूटर, वीडियो गेम का आगमन, कुछ ऐसे कारक हैं जो बच्चों में मोटापा की समस्या को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं।

डॉ यादव ने कहा कि डिजिटल क्रांति ने आमतौर पर जीवन की गति को तेज कर दिया है और कार्य अवधि के बढ़ जाने, टेलीविजन देखने के समय में बढ़ोतरी कुछ ऐसे कारक हैं जिसकी वजह से बच्चों में सोने के समय में लंबे समय तक आंशिक कमी होती रहती है जोकि अनेक जेनेटिक और हार्मोनल परिवर्तनों का कारण बनते हैं। यही सब कारण बच्चों में मोटापा की समस्या के कारक बन जाते हैं।

डॉ यादव ने कहा कि बाल्यावस्था और किशोरावस्था में होने वाली मोटापे की समस्या ही आगे चलकर वयस्कों में उच्च रक्तचाप, लिपिड विकार, मधुमेह, पॉलीसिस्टिक डिंबग्रंथि रोग, पित्ताशय की बीमारी, फैटी लि‍वर, माइग्रेन, पीठ में दर्द, जोड़ों में दर्द, चलने में कठिनाई, अस्थमा और स्लीप एपनिया ( सोते समय सांस के रुकने की समस्या ) जैसी बीमारियों को जन्म देती है।

उन्‍होंने कहा कि इतना ही नहीं बाल्यावस्था और किशोरावस्था में होने वाला मोटापा  बच्चों में अनेक मनोवैज्ञानिक प्रभाव जैसे की चिंता, अवसाद, कम आत्मसम्मान, अव्यवस्थित भोजन करना, स्कूल में अच्छा शैक्षणिक प्रदर्शन न कर पाना, सामाजिक अलगाव और बदमाशी जैसी समस्याओं का भी कारण बनता है।

क्या करें अभिभावक

डॉ यादव सलाह देते हुए कहते हैं कि प्रत्येक अभिभावक को चाहिए कि वे अपने बच्चों को कम शर्करा युक्त भोज्य पदार्थ, सब्जियों, साबुत अनाज और फलों के ज्यादा उपयोग करने के लिए प्रेरित करें। बच्चों में टेलीविजन, कंप्यूटर आदि देखने के समय में कटौती करें और उनको घर से बाहर खेलने के लिए प्रेरित करें।

इसके अतिरिक्‍त बच्चों में स्वस्थ आदत डालने के लिए अभिभावकों को अपने खाने के व्यवहार और टेलीविजन देखने के समय में कमी, घर के बाहर खेलने के लिए समय निकालने जैसे उपाय करने होंगे।

परिवार को भी अपने भोजन के व्यवहार को बदलने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अकेले एक बच्चे के लिए प्रतिबंधित भोजन रखना मुश्किल है। विशेष परिस्थितियों में आहार विशेषज्ञों से सलाह लेने में बिल्कुल भी संकोच नहीं करना चाहिए। अभिभावकों को सदैव यह ध्यान रखना चाहिए की घर में तैयार खाद्य पदार्थ कम कैलोरी और कम वसा युक्त होने के साथ-साथ उच्च पोषण युक्त होना चाहिए।

डॉ यादव ने कहा कि अभिभावकों को कोशिश करनी चाहिए कि 2 वर्ष से कम के बच्चे टेलीविजन, कंप्यूटर, मोबाइल आदि बिल्कुल न देखने पाए और 2 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चे भी 24 घंटे में 2 घंटे से अधिक टेलीविजन आदि न देखने पाएं क्योंकि टेलीविजन देखना भी अत्यधिक भोजन सेवन में सहायक होता है और टीवी कार्यक्रम उन्हें उच्च कैलोरी, कम पोषण मूल्य वाले उत्पादों के विज्ञापन के प्रति आकर्षित करते हैं।

बच्चों में मोटापा रोकने के लिए प्रस्तावित सुझाव

गर्भावस्था के दौरान

1. वजन को नियंत्रित रखें।                   

2.धूम्रपान न करें ।      

3. संयमित व्यायाम करें, जैसा कि सहन किया जा सके।                     

4.गर्भ कालीन मधुमेह को अच्छी तरह से नियंत्रण में रखेंl

जन्म से लेकर 1 वर्ष तक

1. 6 माह तक के बच्चों को केवल मां का दूध पिलाएं बाहर से डिब्बे का दूध, गाय का, भैंस का दूध, पानी, शहद, जन्म घुट्टी आदि न दें।

2. 6 महीने के बाद बच्चे को घर में बना हुआ खाद्य पदार्थ ही दें।

परिवारों के लिए सलाह

1. हमेशा घर में बनाए हुए खाद्य पदार्थों का सेवन निश्चित समय और स्थान पर करें।

2. भोजन, विशेष रूप से नाश्ते को कभी ना छोड़ें ।

3. भोजन के दौरान परिवार का कोई भी व्यक्ति टेलीविजन या मोबाइल ना देखें।

4. अनावश्यक मीठे और वसायुक्त खाद्य पदार्थों से बचें।

5. बच्चों के कमरे में टेलीविजन न लगाएं और उनके टेलीविजन /वीडियो गेम देखने का समय निर्धारित रखें।

6. पुरस्कार के तौर पर बच्चों को खाद्य सामग्री न दें ।

स्कूल के लिए सलाह

1. स्कूल के अंदर कैंटीन में कोई भी फास्ट फूड, कुकीज और कैंडी उपलब्ध नहीं होना चाहिए।

2. स्कूल के अंदर फलों का जूस और एनर्जी ड्रिंक उपलब्ध नहीं होना चाहिएl

3. स्कूलों को फास्ट फूड और कोल्ड ड्रिंक बनाने वाली खाद उद्योगों से आर्थिक सहायता नहीं लेना चाहिए।