7-8 वर्ष की उम्र में ही टेढ़े-मेढ़े दांतों का इलाज करा लेना श्रेयस्कर
विश्व ऑर्थोडॉन्टिक स्वास्थ्य दिवस पर केजीएमयू में मनाया गया समारोह
लखनऊ। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का प्रतिबिंब उसका चेहरा होता है। टेढ़े-मेढ़े दांत जहां चेहरे की सुंदरता पर असर डालते हैं वहीं इनसे अन्य प्रकार की कठिनाइयां जैसे खाने में दिक्कत, ठीक से सफाई में दिक्कत, पायरिया, सही उच्चारण में दिक्कत भी हो सकती है इसलिए बेहतर यही है कि इसका इलाज कम उम्र में यानी 7-8 साल की उम्र में ही करा लेना चाहिये क्योंकि जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे इसके इलाज में कठिनाई की संभावना रहती है।
यह जानकारी विश्व ऑर्थोडॉन्टिक स्वास्थ्य दिवस पर केजीएमयू के ऑर्थोडोटिक्स विभाग में आयोजित कार्यक्रम में विभागाध्यक्ष प्रो प्रदीप टंडन ने दी। उन्होंने बताया कि चेहरे की विकृति एक ऐसी विकृति है जिसे छुपाया नहीं जा सकता चेहरे की विकृति में दातों का अहम रोल है। यदि किसी व्यक्ति के दांत टेढे़-मेढ़े या बाहर की तरफ निकले हैं तो ऐसे व्यक्ति का चेहरा देखने में सुंदर नहीं लगता और ऐसे व्यक्ति को विभिन्न प्रकार की मानसिक प्रताड़नाओं का सामना भी करना पड़ता है तथा वह खाना खाने पीने एवं बोलने में भी असहज महसूस करता है।
उन्होंने बताया कि अव्यवस्थित दांतो की भली-भांति सफाई नहीं हो पाती और उन में कीड़े लग जाते हैं और पायरिया हो जाता है। टेढ़े-मेढ़े या बाहर के निकले दांत बच्चे के मानसिक एवं शारीरिक विकास पर भी बाधा डालते हैं । अव्यवस्थित दातों के कारण जब बच्चे की उसके मित्रों एवं समाज द्वारा बार-बार उपेक्षा की जाती है] उसकी हंसी उड़ाई जाती है तो बच्चा हीन भावना से ग्रसित हो जाता है जिसका सीधा असर उसके मानसिक विकास पर पड़ता है ।
टेढ़े-मेढे दांतों के कारण बहुत से मरीज भोजन ठीक से नहीं चबा पाते जिसके कारण उनके जबड़े के जोड़ व आंतों पर अधिक जोर पड़ता है और इसकी वजह से उनके स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ता है । टेढ़े मेढ़े दांतों की वजह से बोलने पर उच्चारण में भी अंतर आ जाता है। उन्होंने बताया कि ऑर्थोडॉन्टिक्स दंत चिकित्सा विभाग की सबसे पुरानी शाखा है। जिसमें टेढ़े मेढ़े दांतों का पूर्वानुमान निरीक्षण रोकथाम व इलाज किया जाता है। इसके साथ-साथ चेहरे में उपस्थित जबड़ो की हड्डियों का बीच सामंजस्य बैठाया जाता है जिससे चेहरे की सुंदरता बढ़ती है।
प्रो टंडन ने बताया कि अधिकांश ऑर्थोडॉन्टिक इलाज दो तरीकों से किया जाता है। अस्थाई अप्लायंस द्वारा तथा स्थाई अप्लायंस द्वारा। अस्थाई अप्लायंस को मरीज अपनी सुविधानुसार ब्रश करने के समय, नाश्ता करने के समय या खाना खाने के समय निकाल व लगा सकता है अस्थाई अप्लायंस से कुछ ही समस्याओं का इलाज संभव है। इसके विपरीत स्थाई अप्लायंस से इलाज में दांतों के बाहरी व भीतरी सतह पर तार लगाए जाते हैं जिसे मरीज अपनी मर्जी से निकाल व लगा नहीं सकता। यह अप्लायंस मेटल या दांत के रंग के मटेरियल से बने होते हैं जिन्हें मरीज की चाहत या आवश्यकता के अनुसार लगाया जाता है। इस अप्लायंस से इस मर्ज की ज्यादातर समस्याओं का इलाज संभव है। यह इलाज़ मर्ज की समीक्षा के अनुसार डेढ़ वर्ष से लेकर 3 या 4 वर्ष तक चल सकता है। उन्होंने बताया कि कटे हुए होंठ व तालू वाले मरीजों में का इलाज ज्यादा लंबे समय तक चलता है।
इस मौके पर दंत संकाय विभाग के अधिष्ठाता प्रोफ़ेसर शादाब मोहम्मद सहित ऑर्थोडॉन्टिक्स विभाग के संकाय सदस्य, विद्यार्थी, रेजिडेंट डॉक्टर्स, कर्मचारी एवं अन्य विभागों के लोग उपस्थित रहे।
