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‘कफ एंड स्नीज एल्बो प्लीज’ : खांसते-छींकते समय मुंह पर हाथ न रखें

स्‍वाइन फ्लू के खतरे को लेकर सीएमओ ऑफि‍स में आयोजित की गयी कार्यशाला

 लखनऊ। अच्‍छी आदत है खांसते, छींकते समय पर मुंह को ढंकना, लेकिन महत्‍वपूर्ण यह है कि कैसे, हथेली से नहीं, क्‍योंकि खांसने-छींकने से जो वायरस निकलते हैं वे हमारे हाथ पर इकट्ठा हो जायेंगे, और वही हाथ जब हम खाने-पीने की चीजों, दूसरों से हाथ मिलाने, मोबाइल पकड़ने आदि कुछ भी पकड़ने में इस्‍तेमाल करेंगे तो वे वायरस इन चीजों में भी चिपक जायेंगे जो दूसरों तक आसानी से पहुंच सकते हैं। अच्‍छा तो यह है कि टिशू पेपर या कपड़े से मुंह खांसते-छींकते समय मुंह को ढंका जाये लेकिन विशेषकर छींक इतनी अचानक आती है कि आपको शायद टिशू पेपर या कपड़ा निकालने का समय ही न मिले तो ऐसे में बेहतर यह होगा कि खांसते-छींकते समय मुंह और नाक अपनी कुहनी से बंद कर लें। इसे आज से अभी से आदत बना लें।

 

 छोटी किन्‍तु महत्‍वपूर्ण आदत

यह छोटी किन्‍तु महत्‍वपूर्ण बात आज मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय लखनऊ में स्वाइन फ्लू पर एक कार्यशाला में बोलते हुए लखनऊ के प्रसिद्ध चेस्ट रोग फिजीशियन डॉक्टर बीपी सिंह ने स्वाइन फ्लू के कारण, लक्षण, बचाव तथा चिकित्सा पर प्रकाश डालते हुए बतायी। उन्‍होंने कहा कि स्वाइन फ्लू के उपचार से ज्यादा बेहतर इससे बचाव करना है। स्वाइन फ्लू के लक्षणों के बारे में उन्होंने बताया कि यह किसी भी आम फ्लू की तरह होता है जिसमें जुकाम ,खांसी, बुखार,गले में दर्द उल्टी लगना या उल्टी आना, सर दर्द, बदन दर्द आदि होते हैं। इसका संक्रमण ड्रॉपलेट इनफेक्शन के माध्यम से फैलता है। रोगी के खांसने और छीकने से इसके कीटाणु बाहर वातावरण में आते हैं जो किसी भी वस्तु पर 6 से 8 घंटे तक जीवित रहते हैं।

 

इस तरह होता है वायरस का एक से दूसरे में स्‍थानांतरण

स्वस्थ व्यक्ति जब किसी भी कुर्सी दरवाजे या किसी व्यक्ति से हाथ मिलाता है तो यह वायरस उसके हाथ से उसके शरीर में पहुंच जाते हैं। यदि वह अपनी आंखें नाक को छूता है। रोगी औसतन 1 दिन पहले से लेकर 7 दिन तक वायरस वातावरण में फैलाता है। संक्रमित होने के 2 दिन बाद लक्षण प्रकट होते हैं जो कि 1 से 4 दिन तक प्रकट हो सकते हैं। डॉक्टर बी पी सिंह ने बताया कि  बच्चों में, जिनमें कोई अन्य बीमारी हो, 65 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्तियों में,गर्भवती महिलाओं में तथा गंभीर बीमारियों से ग्रसित रोगियों जैसे फेफड़ों की बीमारी, ह्रदय रोग, मधुमेह रक्त की बीमारियां ,कैंसर ,एचआईवी एड्स, लिवर की बीमारी में यह रोग अधिक घातक होता है।

 

अगर ऐसा हो तो हो जायें सावधान

इस रोग में खतरे के लक्ष्ण सांस लेने में तकलीफ होना, सीने में दर्द होना, सुस्ती आना, ब्लड प्रेशर का कम होना ,बलगम में खून आना ,नाखून और होठों का नीला होना प्रमुख है ।इसके बचाव के लिए बार बार साबुन से हाथ धोते रहें, खासते छींकते वक्त मुंह पर हाथ ना रखें बल्कि कपड़ा रखें अथवा अपनी कोहनी से से ढंक लें। इस सीजन में हाथ मिलाने से बचे, नमस्कार करें। बगैर डॉक्टर की सलाह के दवा न लें।

 

मास्क के इस्तेमाल के बारे में भी बताया कि ट्रिपल लेयर सर्जिकल मास्क  का इस्तेमाल ही करना चाहिए। मास्क लगाने के बाद उसका डिस्पोजल भी अत्यंत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए।

 

कार्यशाला का आरंभ करते हुए उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी तथा नोडल अधिकारी डॉ के पी त्रिपाठी ने बताया कि पिछले 4 वर्षों में 2018 में केसेज की संख्या बहुत कम हुई है। उन्होंने कहा कि 2015 में 1087, 2016 में 46, 2017 में 2192 केस हुए थे जिसमें 14 मरीजों की मृत्यु हुई थी लेकिन 2018 में केवल 19 केस सामने आए और एक भी मरीज की मृत्यु नहीं हुई।

 

हाई रिस्‍क वालों को बारिश के एक माह पूर्व लगवा लेनी चाहिये वैक्‍सीन

कार्यशाला में बोलते हुए एसजीपीजीआई की बाल रोग विशेषज्ञ डा. पियाली भट्टाचार्य ने कहा इस वायरस को मारने की दवा नहीं बनी है। बच्चे 10 दिन तक इस रोग के कीटाणुओं को फैलाते रहते हैं और जो बच्चे हाई रिस्क ग्रुप में आते हैं वे महीनों तक इस को फैलाते रहते हैं। 6 महीने से कम उम्र के बच्चों को स्वाइन फ्लू से बचाने का एकमात्र उपाय यही है कि गर्भवती महिला को बारिश का मौसम आने से 1 महीने पहले ही वैक्सीन लगा दी जाये। उन्होंने बच्चों को एक नारा भी दिया कफ एंड स्नीज एल्बो प्लीज इसका मतलब है कि खांसी या छींक आने पर अपना हाथ मुंह पर नहीं रखना चाहिए बल्कि कोहनी के हिस्से से ढंकना चाहिए। उन्होंने बताया कि आने वाले समय में एवियन इनफ्लुएंजा एक बड़ा खतरा बन सकता है जो पक्षियों से मनुष्य में और फिर मनुष्य से मनुष्य में फैलता है।

किसे लगवानी चाहिये वैक्‍सीन

65 वर्ष से ज्‍यादा की आयु वाले

जिनका इलाज कार्टिजोन थैरेपी से चल रहा हो

कैंसर के मरीज

एचआईवी-एड्स के मरीज

हाई डायबिटीज के मरीज

गर्भवती माता को नहीं दे सकते हैं नेजल स्‍प्रे वाली वैक्‍सीन

इसकी वैक्सीन उपलब्ध है जो कि हाई रिस्क ग्रुप के व्यक्तियों के ही लगाई जाती है। वैक्सीन का इस्तेमाल 6 माह से कम उम्र के बच्चों में नहीं किया जाता, इसलिए यह आवश्यक है कि गर्भवती महिलाओं को यह वैक्सीन अवश्य लगाई जाए। गर्भवती माताओं को हम इनएक्टिव वैक्‍सीन लगा सकते हैं लेकिन नेजल स्‍प्रे वाली (एक्टिव) वैक्‍सीन नहीं दे सकते हैं।  वैक्सीन के बारे में उन्होंने बताया कि जो रोगी अथवा रोगियों के संपर्क में आने वाले टेमीफ्लू ले रहे हो ,उन्हें वैक्सीन नहीं दी जानी चाहिए। एक पत्रकार द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि चिकन पॉक्स के मरीज और जिसकी भी इम्‍यून पावर अगर कमजोर है, उसको भी यह वैक्सीन नहीं देनी चाहिए। ठीक होने के 4 सप्ताह बाद यह वैक्सीन दी जा सकती है।

चिकित्‍सक की सलाह के बिना स्‍वाइन फ्लू की जांच न करें पैथोलॉजिस्‍ट

इस कार्यशाला में आईएमए लखनऊ के पूर्व अध्‍यक्ष व वरिष्‍ठ पैथोलॉजिस्‍ट पैथोलॉजिस्ट डॉ पी के गुप्ता ने पैथोलॉजिस्‍ट्स का आह्वान करते हुए कहा कि जब तक चिकित्‍सक सलाह न दें, तब तक स्‍वाइन फ्लू की जांच नहीं करें।। उन्‍होंने कहा कि लोगों को चाहिये कि वे ऐसी जगह टेस्‍ट करायें जहां से दो घंटे के अंदर नमूना जांच के लिए लैब तक पहुंच जाये। आपको बता दें कि डॉ गुप्‍ता की सलाह इसलिए भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है क्‍योंकि कई पैथोलॉजी अपना कलेक्‍शन सेंटर खोले हुए हैं और उनकी लैब शहर से बाहर हैं, ऐसे में नमूना दो घंटे के अंदर पहुंचना लगभग नामुम‍किन है। उन्‍होंने कहा कि जब इस तरह के वायरस के अटैक का खतरा ज्‍यादा हो तो एक-दूसरे से मिलते समय हाथ जोड़कर अभिवादन करें, हाथ या गले न मिलें। उन्‍होंने लोगों को भी सलाह दी कि वे लोग चिकित्‍सक पर जबरदस्‍ती जांच कराने का दबाव न बनायें। कार्यशाला में आईएमए के पदाधिकारी डा प्रांजल अग्रवाल, डा मनीषा भार्गव भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में अपर मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ डीके बाजपेई ने सभी अतिथियों का धन्यवाद दिया।

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