अंगों में विकृति आने से पहले ही होम्‍योपैथिक दवाओं से स्‍थायी उपचार करें रूमेटॉयड अर्थराइटिस का

-इलाज सिर्फ दर्द और सूजन का नहीं, रोग के कारणों का भी होना जरूरी

-रूमेटॉयड अर्थराइटिस पर भी जर्नल में प्रकाशित हुए हैं डॉ गिरीश गुप्‍ता के शोध

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। अर्थराइटिस यूं तो कई प्रकार की होती है लेकिन सबसे ज्‍यादा पायी जाने वाली  रूमेटॉयड अर्थराइटिस है, यह ऑटो इम्‍यून डिजीज है यानी इसमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अपने ही खिलाफ काम करने लगती है। यह जोड़ों से सम्‍बन्धित अत्‍यन्‍त जटिल एवं गम्‍भीर बीमारी है जिसमें शरीर के सारे जोड़ों में सूजन आ जाती है, उनमें भारीपन सा लगने लगता है साथ ही दर्द भी प्रारम्‍भ हो जाता है। अंगुलियों में टेढ़ापन आ जाता है और अंतत: रोगी अपंग हो जाता है।

डॉ गिरीश गुप्‍ता

यह जानकारी यहां राजधानी लखनऊ स्थित गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के संस्‍थापक होम्‍योपैथिक विशेषज्ञ डॉ गिरीश गुप्‍ता ने विश्‍व आर्थरा‍इटिस दिवस के मौके पर ‘सेहत टाइम्‍स’ से विशेष वार्ता में दी। डॉ गिरीश गुप्ता ने बताया कि शरीर में जिस स्थान पर दो या दो से अधिक अस्थि (बोन) और उपास्थि (कार्टिलेज) मिलती है उसे संधि‍ जोड़ कहते हैं जो शरीर को गति प्रदान करते हैं। संधियों के बीच उपस्थित झिल्लियों के कारण जोड़ों का परस्पर रगड़ने तथा घिसने से बचाव होता है।

उन्‍होंने बताया कि अर्थराइटिस अस्थियों से संबंधित एक प्रमुख रोग है जिसे संधिवात भी कहते हैं इसमें जोड़ों में सूजन तथा दर्द होता है आमतौर पर रोगी दर्द होने पर इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेते हैं तथा उचित चिकित्सा के स्थान पर क्षणिक लाभ के लिए दर्द निवारक दवाएं लेते रहते हैं इन दर्द निवारक दवाओं से कुछ देर के लिए राहत अवश्य मिल जाती है लेकिन इससे उनके संपूर्ण शरीर पर अत्यधिक दुष्प्रभाव पड़ता है तथा यह अंदर ही अंदर गंभीर रूप में तब्दील होकर तीव्र दर्द एवं शारीरिक विकृतियों के रूप में सामने आता है।

डॉ गुप्ता ने बताया कि रक्त परीक्षण में आर ए फैक्टर तथा सीआरपी का धनात्मक पाया जाना इस बीमारी की पुष्टि करता है। उन्होंने बताया कि होम्योपैथिक में इसका पूरी तरह से सफल इलाज संभव है, इसमें मरीज की हिस्ट्री लेकर इसके मानसिक कारण तलाशने होते हैं। उन्होंने बताया की होम्योपैथिक से इलाज में होलिस्टिक अप्रोच यानी मस्तिष्क और शरीर के सभी अंगों को एक शरीर मानते हुए मरीज की मानसिक समस्‍याओं और मरीज की प्रकृति के अनुसार दवा का चुनाव करना होता है। उन्होंने बताया की सिर दर्द या सूजन की दवा देने से स्थाई लाभ नहीं होगा जब तक उसके कारण को समाप्त करने के लिए दवा न दी जाए। उन्होंने बताया कि इस रोग में योग और ध्यान का बहुत महत्व है क्योंकि योग से जहां शारीरिक व्याधियों को दूर करने में मदद मिलती है वहीं ध्यान करने से मानसिक स्थिरता और शांति मिलती है।

डॉ गिरीश गुप्ता ने बताया कि रोगी को प्रारंभिक अवस्था में ही दर्द निवारक दवाओं का सहारा न लेकर किसी कुशल होम्‍योपैथिक चिकित्सक से इलाज करवाना चाहिए क्योंकि जब यह रोग बढ़कर शारीरिक विकृतियों के रूप में सामने आता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। उन्‍होंने कहा कि हालांकि अर्थराइटिस को इस अवस्था में भी होम्योपैथिक चिकित्सा द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है परंतु विकृति को पूरी तरह सही नहीं किया जा सकता है।

डॉ गुप्‍ता ने कहा कि अर्थराइटिस के रोगी क्षणिक लाभ के लिए दर्द निवारक दवाएं ले लेते हैं, जिनका दीर्घकालिक उपयोग आरंभ में पेट में दर्द, उल्टी, भूख ना लगना जैसे लक्षणों तथा बाद में आमाशय के अल्सर (गैस्ट्रिक अल्सर) के रूप में सामने आता है। यदि रोगी फिर भी उचित चिकित्सा के स्थान पर दर्द निवारक दवाओं का सेवन करता रहे तो गुर्दे लि‍वर एवं अन्य महत्वपूर्ण अंगों की गंभीर एवं अपूरणीय क्षति हो सकती है तथा रोगी मात्र दर्द से निजात पाने के चक्कर में और अधिक गंभीर एवं जानलेवा बीमारियों के चंगुल में फंस जाता है। एक सवाल के जवाब में डॉ गुप्ता ने कहा कि उन्होंने अपने रिसर्च सेंटर में इस प्रकार के हजारों मरीजों का इलाज किया है तथा इससे सम्‍बन्धित शोध अंतरराष्ट्रीय जनरल में प्रकाशित हुए हैं।