-आईएमए में आयोजित सीएमई में डॉ जेडी रावत ने बताया किन-किन प्रकार की दिक्कतों के लिए क्या-क्या करना चाहिये
सेहत टाइम्स
लखनऊ। किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के पीडियाट्रिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष व आईएमए के निवर्तमान अध्यक्ष डॉ जेडी रावत ने बालकों के ‘विशेष अंग’ में किन प्रकार की पैदाइशी दिक्कतें होती हैं, इनमें किन दिक्कतों में इलाज की जरूरत नहीं होती है, तथा किन दिक्कतों का कैसे इलाज होता है, इसके बारे में अपना व्याख्यान दिया।
आईएमए भवन में 23 मार्च को आयोजित एक दिवसीय सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) एवं स्टेट लेवल रिफ्रेशर कोर्स कार्यक्रम में दिये अपने व्याख्यान के जरिये दी गयी जानकारियों में आम जनता विशेषकर बच्चों के माता-पिता के लिए महत्वपूर्ण संदेश भी था। उन्होंने कहा कि बालकों में अक्सर तीन-चार दिन प्रॉब्लम होती है, पहली प्रॉब्लम में बालकों के ‘विशेष अंग’ की ऊपरी परत नहीं खुलती है, जिसे फाइमोसिस कहा जाता है। उन्होंने बताया कि इस स्थिति में छह से सात साल की आयु तक चिंता करने की बात नहीं होती है, क्योंकि करीब 90 फ़ीसदी ऐसे बच्चे होते हैं जिनका पेशाब का अंग 3 साल तक अपने आप खुल जाता है और बाकी जो 10% होते हैं उनका भी 5-7 साल की आयु तक स्वत: ही खुल जाता है।


उन्होंने बताया कि दूसरी परेशानी यह होती है कि ‘विशेष अंग’ पर ऊपरी त्वचा (प्रीप्यूज) के नीचे कभी-कभी स्मेग्मा (सफेद पीला गाढ़ा द्रव्य) जम जाता है। उसे लोग समझते हैं कि पस पड़ गया है लेकिन उससे परेशान होने की जरूरत नहीं है, इसे साफ कर लेना चाहिये। इसी प्रकार एक और समस्या होती है जिसे पैथोलॉजिकल फाइमोसिस कहते हैं। इसमें पेशाब के अंग की चमड़ी (प्रीप्यूज) का आगे का हिस्सा सिकुड़ जाता है, जिससे चमड़ी पीछे की ओर नहीं जाती है, ऐसी स्थिति में जब बच्चा पेशाब करता है तो पेशाब उसी चमड़ी में भर जाती है और धीरे-धीरे निकलती है ऐसे में कई बार संक्रमण हो जाता है, यह नुकसानदायक होता है। इसलिए ऐसे में संक्रमण को समाप्त करने के लिए चिकित्सक की सलाह से ‘विशेष अंग’ की त्वचा को आगे से थोड़ी सी कटवा दें अथवा सरकमसीजन यानी खतना से उसका सकरापन समाप्त कर दें जिससे पेशाब आसानी से निकल जायेगी और संक्रमण नहीं होगा।
डॉ रावत ने बताया कि एक और समस्या है पैरा फाइमोसिस। इसमें ‘विशेष अंग’ में नैरो रिंग को पीछे करके खोलने के बाद यदि वापस बंद नहीं किया तो वह पीछे रिंग से दबाव बना लेता है जिसे कन्सट्रिक्शन रिंग कहा जाता है, यह स्थिति बहुत पीड़ादायक होती है, कभी-कभी पेशाब रुक भी जाती है। ऐसा होने पर चिकित्सक से सम्पर्क करना चाहिये जो कि एक छोटी सी प्रक्रिया से रिंग को काटकर या कम्प्रेस कर अथवा इंजेक्शन से स्थिति नॉर्मल कर देते हैं। इसी प्रकार एक स्थिति बलेनो प्रोस्थाइटिस की भी होती है। जोकि संक्रमण से होता है, इसीलिए नहाते समय ‘विशेष अंग’ को खोलकर सफाई जरूर करनी चाहिये।
डॉ रावत ने बताया कि एक और परेशानी होती है कि कुछ बच्चों के ‘विशेष अंग’ में पेशाब के लिए बना छेद सामान्य जगह यानी आगे की तरफ नहीं होता है, यह छेद ‘विशेष अंग’ के नीचे की तरफ पीछे होता है, ऐसे में सर्जरी की जाती है और पेशाब का रास्ता नियत जगह पर बनाया जाता है।
इसके पीछे के कारणों की बात करें तो 80 से 90 प्रतिशत केसों में कोई कारण सामने नहीं आता है, लेकिन यह देखा गया है कि यदि पिता को है तो बच्चे में 7 प्रतिशत होने की आशंका रहती है और यदि पिता और एक बच्चे में है तो दूसरे बच्चे में 14 प्रतिशत होने की आशंका होती है और पिता व अगर दोनों पुत्रों में यह दिक्कत रही है तो आने वाले बच्चे में इसकी संभावना 21 प्रतिशत हो जाती है। इसके अतिरिक्त गर्भावस्था में महिला ओरल पिल्स का सेवन करती है तो हार्मोनल बैलेंस गड़बड़ा जाता है। इसके अतिरिक्त आजकल चल रहे फास्ट फूड बहुत नुकसानदायक हैं, क्योंकि प्रिजरवेटिव फूड में जिन केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है ये पुरुषों के टेस्टोहारमोन के मेटाबोलिज्म पर हमला करते हैं, इसमें देखा गया है कि ऐसे परिवार में भी यह दिक्कतें ज्यादा होती हैं।
सीएमई का उद्धाटन पूर्व अध्यक्ष डॉ रुखसाना खान के द्वारा किया गया। अध्यक्ष डॉ सरिता सिहं ने आये हुए अतिथियों का स्वागत किया। इस मौके पर साइंटिफिक कमेटी के सलाहकार डॉ जी पी सिहं, साइंटिफिक कमेटी के चेयरमैन डॉ जेडी रावत, निवर्तमान अध्यक्ष डॉ विनीता मित्तल, अध्यक्ष निर्वाचित डा० मनोज कुमार अस्थाना ने आयोजन की सराहना की और कहा कि इस से डाक्टरों के ज्ञान में वृद्धि होती है, इस तरह के कार्यक्रम होते रहने चाहिये। आईएमए लखनऊ के सचिव डा संजय सक्सेना ने ‘स्वच्छ एवं स्वस्थ लखनऊ’ बनाने की बात कही। कार्यक्रम के अंत में सचिव डॉ संजय सक्सेना ने धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ गुरमीत सिंह एवं डॉ अनिल कुमार त्रिपाठी ने किया।
