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	<title>whole life &#8211; Sehat Times | सेहत टाइम्स</title>
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	<description>Health news and updates &#124; Sehat Times</description>
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		<title>गर्भ ठहरने के बाद से 1000 दिन शिशु के पूरे जीवन के लिए कितने महत्‍वपूर्ण, जानकर चौंक जायेंगे आप</title>
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		<pubDate>Sat, 01 Feb 2020 16:40:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="489" height="392" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" decoding="async" style="display: block; margin-bottom: 5px; clear:both;max-width: 100%;" link_thumbnail="" srcset="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel.jpg 489w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel-300x240.jpg 300w" sizes="(max-width: 489px) 100vw, 489px" />-वैज्ञानिक रूप से हो चुका है सिद्ध, जैसा चाहें वैसा बना लें अपने बच्‍चे को -ब्रह्मकुमारीज से जुड़ीं चिकित्‍सक बीके डॉ शुभादा नील ने दीं अत्‍यन्‍त महत्‍वपूर्ण जानकारियां धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना लखनऊ। हम मां का सपना होता है कि उसकी संतान स्‍वस्‍थ हो, सदा मुस्‍कुराती रहे, मजबूत हो, भावनाओं की कद्र करने वाली हो, मजबूत इरादों &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="489" height="392" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" decoding="async" loading="lazy" style="display: block; margin-bottom: 5px; clear:both;max-width: 100%;" link_thumbnail="" srcset="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel.jpg 489w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel-300x240.jpg 300w" sizes="(max-width: 489px) 100vw, 489px" /><h5><span style="color: #0000ff;"><strong>-वैज्ञानिक रूप से हो चुका है सिद्ध</strong><strong>, जैसा चाहें वैसा बना लें अपने बच्&#x200d;चे को</strong></span></h5>
<h5><span style="color: #0000ff;"><strong>-ब्रह्मकुमारीज से जुड़ीं चिकित्&#x200d;सक बीके डॉ शुभादा नील ने दीं अत्&#x200d;यन्&#x200d;त महत्&#x200d;वपूर्ण जानकारियां</strong></span></h5>
<figure id="attachment_17166" aria-describedby="caption-attachment-17166" style="width: 547px" class="wp-caption aligncenter"><img decoding="async" loading="lazy" class=" wp-image-17166" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel.jpg" alt="" width="547" height="439" srcset="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel.jpg 489w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2020/02/BK-Dr.Shubhada-Neel-300x240.jpg 300w" sizes="(max-width: 547px) 100vw, 547px" /><figcaption id="caption-attachment-17166" class="wp-caption-text"><em><strong>बीके डॉ शुभादा नील</strong></em></figcaption></figure>
<p><strong>धर्मेन्&#x200d;द्र सक्&#x200d;सेना</strong></p>
<p><strong>लखनऊ।</strong> हम मां का सपना होता है कि उसकी संतान स्&#x200d;वस्&#x200d;थ हो, सदा मुस्&#x200d;कुराती रहे, मजबूत हो, भावनाओं की कद्र करने वाली हो, मजबूत इरादों वाली हो, यानी सर्वगुण सम्&#x200d;पन्&#x200d;न हो। ऐसा संभव है और इसके लिए करना सिर्फ इतना है कि शिशु जब से गर्भ में आये तब से पैदा होने तक तथा पैदा होने के बाद दो साल यानी गर्भावस्&#x200d;था और दो साल को मिलाकर करीब 1000 दिन तक मां को अपने खानपान, अपनी सोच, आचार-विचार पर अवश्&#x200d;य ध्&#x200d;यान देना होगा, इसके साथ ही बच्&#x200d;चे के आसपास का माहौल भी अच्&#x200d;छा खुशहाल, पॉजिटिव एनर्जी वाला होगा तो निश्चित रूप से बच्&#x200d;चा गुणवान होगा।</p>
<p>यह बात यहां स्&#x200d;मृति उपवन में चल रहे ऑल इंडिया ऑब्&#x200d;स्&#x200d;ट्रेटीशियन्&#x200d;स एंड गाइनीकोलॉजिस्&#x200d;ट्स एसोसिएशन की 63वीं कॉन्&#x200d;फ्रेंस AICOG 2020 में चौथे दिन बीके डॉ शुभादा नील ने कही। आपको बता दें कि डॉ शुभादा नील ब्रह्मकुमारी से भी जुड़ी हुई हैं तथा नवी मुम्&#x200d;बई में उनका 50 बेड का हॉस्पिटल है। बीके डॉ शुभादा ने कहा कि बच्&#x200d;चे आजकल इमोशनली स्&#x200d;टेबिल नहीं हो रहे हैं, लेकिन जरूरत इस बात की है कि चाहे कुछ भी परिस्थिति आयें उनसे बाहर निकालने के लिए बच्&#x200d;चों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्&#x200d;वस्&#x200d;थ और मजबूत होना जरूरी है।</p>
<p>डॉ शुभादा बताती हैं कि गर्भावस्&#x200d;था में तथा डिलीवरी के बाद का दो साल का पीरियड जो होता है उसमें बच्&#x200d;चे के सीखने की शक्ति बहुत जबरदस्&#x200d;त होती है, इस अवधि में बच्&#x200d;चा जो भी अपने आसपास देखेगा, वह उसे जिन्&#x200d;दगी भर के लिए सीख जायेगा। जैसे इस दौरान आसपास पॉजिटिव वातावरण होगा तो पॉजिटिव, निगेटिव वातावरण होगा तो निगेटिव बातें वह सीख जायेगा। जैसे छोटी-छोटी बातों में मूड ऑफ होना, रोना, दुख करना और चाहें यह कि बच्&#x200d;चा सदा मुस्&#x200d;कुराता रहे तो यह नहीं हो सकता है। उन्&#x200d;होंने बताया कि इसीलिए गर्भवती माताओं को खुश रहने की सलाह दी जाती है। उनके खानपान, एक्&#x200d;सरसाइज, योगा, खुश रहने के लिए मेडीटेशन की सलाह दी जाती है।</p>
<p>डॉ शुभादा ने बताया कि कम्&#x200d;प्&#x200d;यूटर की भाषा में समझें तो यह समय ऐसा होता है जब बच्&#x200d;चे में सॉफ्टवेयर डेवलेप हो रहा होता है, तो जैसी मां होगी वैसा ही सॉफ्टवेयर डेवलेप होगा जैसा सॉफ्टवेयर होगा वैसा हार्डवेयर होगा यानी बड़ा होकर बच्&#x200d;चे का स्&#x200d;वभाव वैसा ही होगा।</p>
<p>बीके डॉ शुभादा ने बताया कि वैज्ञानिक रिसर्च में देखा गया है कि 1000 दिन की अवधि का बच्&#x200d;चे के निर्माण में जो असर पड़ता है उसमें सिर्फ जीन्&#x200d;स का नहीं, पर्यावरण का भी काफी असर पड़ता है। जैसे हमारे घर में बहुत खुशी होगी, प्&#x200d;यार होगा तो होने वाले बच्&#x200d;चे बहुत खुशी, शांति, प्&#x200d;यार से रहते हैं और अगर गुस्&#x200d;सा हो रहा है तो बच्&#x200d;चे भी गुस्&#x200d;से वाले हो जाते हैं, तथा मन और शरीर से ऐसे बच्&#x200d;चे कमजोर भी रहते हैं क्&#x200d;योंकि मां अगर गुस्&#x200d;सा कर रही है तो उसका ब्&#x200d;लड सप्&#x200d;लाई भी बच्&#x200d;चे की तरफ कम जाता है ऐसे में बच्&#x200d;चा कमजोर होता है, कमजोर बच्&#x200d;चे कभी-कभी अंदर पॉटी कर देते हैं तो उनको बचाने के लिए गर्भवती का मां का सिजेरियन करना मजबूरी हो जाती है। उन्&#x200d;होंने बताया कि वैज्ञानिक रूप से भी यह प्रमाणित है कि कमजोर बच्&#x200d;चे जो होते हैं उन्&#x200d;हें आगे चलकर ब्&#x200d;लड प्रेशर, डायबिटीज जैसी बीमारियां (एडल्&#x200d;ट डिजीजेज) होने की संभावना ज्&#x200d;यादा रहती है।</p>
<p>उन्&#x200d;होंने बताया कि खानपान पर वातावरण और सोच का असर होता है। जैसे कि हलुआ होटल से खरीद कर खायें, हलुआ घर पर बनाकर खायें और हलुआ भंडारे में प्रसाद के रूप में खायें, तीनों हलुओं का स्&#x200d;वाद अलग-अलग होगा, ऐसा इसलिए कि तीनों को तैयार करते समय तैयार करने वाले और आसपास के वातावरण में भिन्&#x200d;नता थी। उन्&#x200d;होंने बताया कि इसकी मान्&#x200d;यता हमारी संस्&#x200d;कृति में तो थी लेकिन वैज्ञानिक रिसर्च में भी यह बात पायी गयी है कि खाने-पीने की चीजों पर भी भावनाओं का कितना असर होता है। रिसर्च के बार में उन्&#x200d;होंने बताया कि जापानी साइंटिस्&#x200d;ट डॉ मैसारो इमाटो ने रिसर्च की जिसमें उन्&#x200d;होंने दो बोतल पानी की लीं एक पर लिखा प्&#x200d;यार और दूसरी पर लिखा नफरत। इन बोतलों से  पानी किसी को पीना नहीं था बस लोग आयें और उन बोतलों को देखकर सिर्फ मन ही मन बोलना था कि प्&#x200d;यार और नफरत। इसके बाद  उन बोतलों से पानी की एक-एक बूंद लेकर उसे इलेक्&#x200d;ट्रॉन माइक्रोस्&#x200d;कोप के अंदर रखा गया और विशेष फोटोग्राफी मशीन से फोटोग्राफ लिये गये तो पाया गया कि जिस बोतल में प्&#x200d;यार लिखा था उसकी पानी की बूंद की फोटो सुंदर रंगोली जैसी आयी और जिस पर नफरत लिखा था उसकी फोटो काली स्&#x200d;पॉट वाली आयी।</p>
<p>बीके डॉ शुभादा ने कहा कि आजकल बीमारियां जो बढ़ रही है उसका बीज हमारी सोच में छिपा है इसलिए पहले कहा जाता था कि पहले सोचो फि&#x200d;र बोलो, फि&#x200d;र कहा गया करने से पहले सोचो तब बोलो और अब कहा जाता है कि सोचने से पहले सोचो कि क्&#x200d;या आपकी सोच में शांति है, खुशी है, प्&#x200d;यार है क्&#x200d;योंकि जो आप सोचोगे, वही आप बोलोगे, और वही कर्म करोगे, और जब वही कर्म बार-बार करेंगे तो आपका वही आपका चरित्र बनेगा और फि&#x200d;र वही भाग्&#x200d;य बनेगा। इसलिए जो मां सोचेगी वही उसके बच्&#x200d;चे का भाग्&#x200d;य बनने वाला है इसीलिए मां को बहुत सोच समझकर सोचना है।</p>
<p>उन्&#x200d;होंने कहा कि इसीलिए किसी ने क्&#x200d;या खूब कहा है</p>
<p><span style="color: #0000ff;">सोच को बदलिये तो सितारे बदल जायेंगे,</span></p>
<p><span style="color: #0000ff;">नजर को ब&#x200d;दलिये तो नजारे बदल जायेंगे,</span></p>
<p><span style="color: #0000ff;">कश्तियों को बदलने की जरूरत नहीं सिर्फ</span></p>
<p><span style="color: #0000ff;">दिशायें बदलिये तो किनारे खुद-ब-खुद बदल जायेंगे</span></p>
<p>डॉ शुभादा ने कहा कि अगर किसी के खानदान में कोई बीमारी है, तो कहा जाता है कि बच्&#x200d;चे को तो होगी ही, लेकिन ऐसा नहीं है, शरीर में जीन्&#x200d;स अगर कैंसर के हैं तो हमारा वातावरण, खानपान, व्&#x200d;यायाम, हमारी सोच इसे होने से रोक सकती है, यह रिसर्च हो चुकी है।</p>
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