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	<title>Stop &#8211; Sehat Times | सेहत टाइम्स</title>
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	<description>Health news and updates &#124; Sehat Times</description>
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		<title>मौत की चेतावनी भी आखिर रोक क्‍यों नहीं पा रही नशा करने से ?</title>
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		<pubDate>Sat, 30 Jul 2022 07:40:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<img width="218" height="167" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/warning.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" decoding="async" style="display: block; margin-bottom: 5px; clear:both;max-width: 100%;" link_thumbnail="" />तम्‍बाकू से पूरी दुनिया में 70 लाख और भारत में करीब 12 लाख लोग प्रति वर्ष अकाल मृत्‍यु के शिकार हो जाते हैं। सरकार ने अब तम्‍बाकू उत्‍पादों पर एक नयी चेतावनी ‘तम्‍बाकू सेवन यानी अकाल मृत्‍यु’ लिखना अनिवार्य किया है। प्रश्‍न यह उठता है कि तम्‍बाकू उत्‍पादों पर स्‍लोगन और फोटो के जरिये दी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<img width="218" height="167" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/warning.jpg" class="webfeedsFeaturedVisual wp-post-image" alt="" decoding="async" loading="lazy" style="display: block; margin-bottom: 5px; clear:both;max-width: 100%;" link_thumbnail="" />
<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:22px"><strong><em>तम्&#x200d;बाकू से पूरी दुनिया में 70 लाख और भारत में करीब 12 लाख लोग प्रति वर्ष अकाल मृत्&#x200d;यु के शिकार हो जाते हैं। सरकार ने अब तम्&#x200d;बाकू उत्&#x200d;पादों पर एक नयी चेतावनी ‘तम्&#x200d;बाकू सेवन यानी अकाल मृत्&#x200d;यु’ लिखना अनिवार्य किया है। प्रश्&#x200d;न यह उठता है कि तम्&#x200d;बाकू उत्&#x200d;पादों पर स्&#x200d;लोगन और फोटो के जरिये दी जा रही चेतावनियों के बावजूद नशे को हतोत्&#x200d;साहित करने के कारगर परिणाम आखिर क्&#x200d;यों नहीं मिल रहे हैं। यह सवाल जब क्&#x200d;लीनिकल साइकोलॉजिस्&#x200d;ट सावनी गुप्&#x200d;ता से किया गया तो उन्&#x200d;होंने बताया कि क्&#x200d;या है इसकी वजह, और लोगों पर असर हो, इसके लिए क्&#x200d;या किया जा सकता है&#8230;</em></strong></p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="aligncenter size-large is-resized"><img decoding="async" loading="lazy" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/Sawani-Gupta-1024x535.jpg" alt="" class="wp-image-36548" width="768" height="401" srcset="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/Sawani-Gupta-1024x535.jpg 1024w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/Sawani-Gupta-300x157.jpg 300w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/Sawani-Gupta-768x402.jpg 768w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/Sawani-Gupta-1536x803.jpg 1536w, http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/Sawani-Gupta-2048x1071.jpg 2048w" sizes="(max-width: 768px) 100vw, 768px" /><figcaption> <strong><em>सावनी गुप्&#x200d;ता, क्&#x200d;लीनिकल साइकोलॉजिस्&#x200d;ट</em></strong></figcaption></figure></div>


<p>तम्&#x200d;बाकू खाने या सिगरेट पीने से शरीर को नुकसान होता है, इस बात का डर पैदा करने के लिए लम्&#x200d;बे समय से इनके उत्&#x200d;पादों पर वैधानिक चेतावनी लिखे जाने की मुहीम चल रही है, इसके लिए नियम-कानून भी बने हैं। शुरुआत से देखें तो पहले लिखा होता था कि ‘सिगरेट पीना स्&#x200d;वास्&#x200d;थ्&#x200d;य के लिए हानिकारक हो सकता है’ जो बाद में ‘सिगरेट पीना स्&#x200d;वास्&#x200d;थ्&#x200d;य के लिए हानिकारक है’, फि&#x200d;र कैंसर का चित्र, कैंसरग्रस्&#x200d;त मुंह का चित्र और अब बीती 21 जुलाई को &nbsp;नियमों में संशोधन करते हुए नयी गाइडलाइन के अनुसार इस उत्&#x200d;पादों पर ‘तम्&#x200d;बाकू सेवन यानी अकाल मृत्&#x200d;यु’ लिखना अनिवार्य कर दिया गया है।</p>



<p>आखिर क्&#x200d;या वजह है कि चेतावनी की भाषा बदलने, कैंसरग्रस्&#x200d;त मुंह का चित्र छापने जैसे कदम उठाये जाने के बावजूद इसका सेवन करने वालों के मन-मस्ति&#x200d;ष्&#x200d;क में तम्&#x200d;बाकू के प्रति डर अपेक्षानुसार पैदा नहीं हो पा रहा है। इसी मुद्दे पर ‘सेहत टाइम्&#x200d;स’ ने अलीगंज स्थित <strong>सेंटर फॉर मेंटल हेल्&#x200d;थ </strong><strong>&#8216;</strong><strong>फेदर्स</strong><strong>&#8216;</strong> की क्&#x200d;लीनिकल साइकोलॉजिस्&#x200d;ट सावनी गुप्&#x200d;ता, जिन्&#x200d;होंने नशा उन्&#x200d;मूलन पर भी कार्य किया है, से बात की। उनसे जानना चाहा कि आखिर ऐसा कौन सा मनोविज्ञान है जो गंभीर रोगों और मौत के डर पर भारी पड़ रहा है।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:26px"><strong>आकर्षक विज्ञापन </strong><strong></strong></p>



<p>इस बारे में सावनी ने बताया कि नशे की लत छुड़ाने के लिए सिर्फ वैधानिक चेतावनी और चित्र से संदेश देना काफी नहीं है, हमारे आसपास का वातावरण कैसा है, इसका भी बहुत असर पड़ता है। तम्&#x200d;बाकू उत्&#x200d;पादों का विज्ञापन, दुकानों, मॉल में एलईडी लाइट्स के बीच उनका डिस्&#x200d;प्&#x200d;ले भी इन उत्&#x200d;पादों के प्रति आकर्षण बढ़ाता है। सड़क पर गुमटियां भले ही कितनी छोटी या टूटी-फूटी हों लेकिन उसमें रखी सिगरेट बड़े ही फैन्&#x200d;सी ढंग से डिस्&#x200d;प्&#x200d;ले की जाती हैं। वे कहती हैं कि वैधानिक चेतावनियों, कैंसर जैसे रोग के भयावह चित्रों आदि के माध्&#x200d;यम से नशे के लती जिन व्&#x200d;यक्तियों के अंदर हम डर पैदा करना चाहते हैं, उनके शरीर की केमिस्&#x200d;ट्री पर भी हमें ध्&#x200d;यान देना होगा, इसके साथ ही उनकी हिस्&#x200d;ट्री भी देखनी जरूरी है। हिस्&#x200d;ट्री जो एक दिन में नहीं बनी है, इसके लिए हमें उनके बचपन, किशोरावस्&#x200d;था में जाना होगा।</p>


<div class="wp-block-image">
<figure class="alignright size-full"><img decoding="async" loading="lazy" width="218" height="167" src="http://sehattimes.com/wp-content/uploads/2022/07/warning.jpg" alt="" class="wp-image-36549"/></figure></div>


<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:26px"><strong>क्&#x200d;या सोचते हैं बच्&#x200d;चे</strong><strong></strong></p>



<p>सावनी कहती हैं कि सोचिये जब एक बच्&#x200d;चा अपने घर में पिता या दूसरे लोगों को पैदा होने के बाद सालों-साल से सिगरेट पीते हुए, तम्&#x200d;बाकू खाते हुए देखता है, तो वह सोचता है कि अगर तम्&#x200d;बाकू या सिगरेट इतनी ही हानिकारक है तो हमारे घर के बड़े लोग वर्षों से इसका सेवन क्&#x200d;यों कर रहे हैं&#8230; इनको तो कुछ नहीं हुआ&#8230; ये तो अभी तक जीवित हैं&#8230;आदि-आदि। सावनी कहती हैं कि कई बार तो ये उत्&#x200d;पाद घरवाले&nbsp; बच्&#x200d;चों से ही मंगाते हैं। यही नहीं घर में, छत पर, बाथरूम में भी अगर आप सिगरेट पी रहे हैं तो कहीं न कहीं पैसिव स्&#x200d;मोकिंग का शिकार तो बच्&#x200d;चे बन ही रहे हैं।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:26px"><strong>चलो टेस्&#x200d;ट करते हैं&#8230;</strong><strong></strong></p>



<p>जब ये ही बच्&#x200d;चे थोड़ा बड़े होते हैं और घर के बाहर निकलते हैं, उन पर कोई प्रतिबंध नहीं रहता है तो वह दोस्&#x200d;तों के साथ तम्&#x200d;बाकू, सिगरेट पीते हैं या ये चीजें नहीं मिलीं तो हुक्&#x200d;का, हुक्&#x200d;के के कई दूसरे प्&#x200d;लेवर जैसी चीजें उन्&#x200d;हें उपलब्&#x200d;ध हो जाती हैं, और फि&#x200d;र शुरुआत होती है उसका जायका लेने या उसे टेस्&#x200d;ट करने की। उनकी सोच यह होती है कि अभी इसे ले लेते हैं जब लत पड़ने लगेगी तो छोड़ देंगे लेकिन ऐसा होता नहीं है क्&#x200d;योंकि धीरे-धीरे यही आदत बन जाती है, और फि&#x200d;र एडल्&#x200d;ट होने की एज पर आते-आते यह लत का रूप ले लेती है। यानी उनका माइन्&#x200d;ड इसका आदी हो जाता है, और इसके बाद फि&#x200d;र वे इसे चाहकर भी नहीं छोड़ पाते हैं क्&#x200d;योंकि यह उनके शरीर की न्&#x200d;यूरो बायोलॉजी की आवश्&#x200d;यकता बन जाती है।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:26px"><strong>दिमाग को फौरी सुकून</strong><strong></strong></p>



<p>यह आवश्&#x200d;यकता कैसे बन जाती है इस बारे में सावनी बताती हैं कि जैसे ही व्&#x200d;यक्ति किसी से लड़ाई, कहासुनी होने पर तनाव में आने पर&nbsp; सिगरेट पीता है, तो उसके ब्रेन में रिसेप्&#x200d;टर रिलीज होते हैं, जिन्&#x200d;हें निको&#x200d;टीन एब्&#x200d;जॉर्शन रिसेप्&#x200d;टर्स कहते हैं, जिसे वह ऑब्&#x200d;जर्व कर लेता है, तम्&#x200d;बाकू निकोटिन रिलीज करता है। व्&#x200d;यक्ति जब ऑब्&#x200d;जर्व कर लेता है तो न्&#x200d;यूरो ट्रांसमीटर्स जैसे कि गाबा, डोपामिन शरीर से रिलीज होते हैं, ये न्&#x200d;यूरो ट्रांसमीटस गुस्&#x200d;से, तनाव की स्थिति में शरीर को हेल्&#x200d;प करते हैं और अचानक व्&#x200d;यक्ति आराम महसूस करता है। उस समय के लिए व्&#x200d;यक्ति को एक खुशी का अहसास होता है, लेकिन थोड़े समय की खुशी धीरे-धीरे आदत में बदल जाती है, और फिर व्&#x200d;यक्ति उसका लती बन जाता है।&nbsp;</p>



<p>सावनी बताती हैं कि मैं माता-पिता से भी यह कहना चाहूंगी कि बहुत बार बच्&#x200d;चे खुशी या मजा लेने के लिए नशा करते हैं, तो ऐसे में अपने बच्&#x200d;चों को ऐसे खेल या किसी अन्&#x200d;य एक्टिविटी में व्&#x200d;यस्&#x200d;त रखें जो उनके अंदर खुशी पैदा करे जिससे बच्&#x200d;चे नशे से मिलने वाले आनन्&#x200d;द की ओर न भागें।</p>



<p>सावनी कहती हैं कि लती होने के बाद जब व्&#x200d;यक्ति नशा छोड़ना भी चाहता है तो शरीर के अंदर जब नशे की फीलिंग आती है तो वह उस व्&#x200d;यक्ति पर इसकदर हावी होती हैं कि उस समय इस तरह की वैधानिक चेतावनियों को व्&#x200d;यक्ति नजरअंदाज कर देता है, क्&#x200d;योंकि ऐसी चेतावनियां वह लगातार देखता आता है तो इसका आदी हो चुका होता है।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:26px"><strong>बार के लिए एज बार तो तम्&#x200d;बाकू के लिए क्&#x200d;यों नहीं</strong><strong></strong></p>



<p>इसके समाधान की दिशा में सुझाव देते हुए सावनी बताती हैं कि नशे की वस्&#x200d;तुओं की उपलब्&#x200d;धता बच्&#x200d;चों से दूर होनी चाहिये जैसे कि बार में जाने के लिए एज का सर्टीफि&#x200d;केट दिखाना अनिवार्य है, लेकिन सिगरेट या पान मसाला छोटी-छोटी दुकानों, यहां तक कि चौराहों, सड़कों पर हाथों में लेकर खड़े होकर बेचने वाले लोगों के पास भी उपलब्&#x200d;ध है, जो बच्&#x200d;चों तक को आसानी से उपलब्&#x200d;ध हो जाते हैं।</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color" style="font-size:26px"><strong>शौक कब लत बन जाती है पता ही नहीं चलता</strong><strong></strong></p>



<p>उन्&#x200d;होंने बताया कि मैंने जो नशा उन्&#x200d;मूलन पर कार्य किया है उसमें मैं इस नतीजे पर पहुंची हूं कि शुरुआत में शौकिया रूप से किया गया नशा बाद में लत बन जाता है, उस समय वे लोग इसे छोड़ने की भी सोचते हैं और उसी समय वे उन वैधानिक चेतावनियों को भी गहराई से लेते हैं&nbsp; लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है, और वे चाहकर भी नहीं छोड़ पाते। इसीलिए सर्वाधिक आदर्श स्थिति यह है कि नशा उन्&#x200d;मूलन की शुरुआत परिवार, घर में ही बच्&#x200d;चों, किशोरों को नशे के माहौल से दूर रखने से की जानी चाहिये। जहां तक बड़े जो इसके लती हो चुके हैं, की बात है तो इसके लिए नशा छोड़ने के प्रति उनकी इच्&#x200d;छाशक्ति बहुत तेज होनी चाहिये इसके साथ ही उन्&#x200d;हें किसी मनोवैज्ञानिक, मनोचिकित्&#x200d;सक अथवा नशा उन्&#x200d;मूलन केंद्र से सम्&#x200d;पर्क कर नशा छोड़ने में सहायक इलाज लेना चाहिये। उन्&#x200d;होंने कहा कि हम लोग मोटिवेशन इन्&#x200d;हेंसमेंट थेरेपी कहते हैं जिसमें मोटिवेशन बढ़ाया जाता है। क्&#x200d;योंकि जब व्&#x200d;यक्ति नशा छोड़ना चाहता है तो व्&#x200d;यक्ति के आसपास का वातावरण, जो उसे नशा करने के प्रति प्रेरित कर रहा है, अगर उस पर हावी होना बंद हो जाये तो वह नशा छोड़ देगा, यह चीज अंदर से आती है और यह इच्&#x200d;छाशक्ति की मजबूती पर निर्भर करती है, इसी इच्&#x200d;छा शक्ति को मोटिवेशन बढ़ा कर मजबूत किया जाता है। &nbsp;</p>
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